शिमला 7 अगस्त,
हिम नयन ्रनयूज/ ब्यूरो /वर्मा
हरित परिवर्तन से जोड़ा जाएगा, और भविष्य में इसे 2,500 से अधिक उद्यमों तक बढ़ाने की योजना है। इस लक्ष्य को पूरा
करने के लिए केंद्र सरकार की ‘ग्रीनिंग ऑफ MSMEs’ योजना के तहत पहले चरण में हिमाचल उद्योग विभाग की ओर से
जागरूकता कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। इसी कड़ी में 7 अगस्त 2025 को सिरमौर जिले के पौंटा साहेब और
कालाअंब और में कार्यशालाएं आयोजित की गई।
‘ग्रीनिंग ऑफ MSMEs’ पहल के तहत भारत सरकार के RAMP (राइजिंग एंड एक्सेलेरेटिंग MSME परफॉर्मेंस) कार्यक्रम का
अहम हिस्सा है, जिसे विश्व बैंक का समर्थन प्राप्त है।

उद्योग विभाग, हिमाचल प्रदेश और फ्रॉस्ट एंड सुलिवन और टिंज कंसल्टेंसी के संयुक्त तत्वाधान से आयोजित इन
कार्यशालाओं में प्रतिभागियों को संसाधन-कुशल स्वच्छ उत्पादन (RECP), शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य, पर्यावरण, सामाजिक
और प्रशासनिक (ESG) ढांचे, परिपत्र अर्थव्यवस्था और कार्बन उत्सर्जन कम करने की योजनाओं जैसे आधुनिक विषयों से
अवगत कराया गया।
साथ ही डिजिटल निगरानी प्रणाली, हरित तकनीक प्रदाताओं तक पहुंच और वित्तीय सहायता के
विकल्पों की जानकारी भी दी गई, ताकि MSMEs अपने व्यवसाय को और अधिक टिकाऊ बना सकें। कार्यशाला में आये
प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए। इस मौके पर सिंगल विंडो क्लियरेंस एजेंसी से इकोनॉमिक इन्वेस्टीगेटर श्री बाल
मुकुंद और रैंप कंसलटेंट मातवर ठाकुर भी उपस्थित रहे।
कार्यशाला में हिमाचल चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के चेयरपर्सन श्री सतीश गोयल ने MSMEs को हरित बनाने से
संबंधित विभिन्न योजनाओं एवं पहलों की सराहना की, साथ ही MSME विभाग द्वारा प्रदान की जा रही अन्य योजनाओं का
भी उल्लेख किया। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर ज़ोर दिया कि इन योजनाओं का लाभ उन MSMEs तक पहुँचना
चाहिए जिन्हें इनकी वास्तव में आवश्यकता है, और इसके लिए प्रक्रिया को सरल एवं सुगम बनाया जाना अत्यंत आवश्यक
है।
इसके साथ ही DFO, MSME से सहायक निदेशक ग्रेड-1, IEDS श्री ए.के. गौतम ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय
(MSME) की अन्य योजनाओं पर एक प्रभावशाली प्रस्तुति दी, जिन्हें MSMEs द्वारा अत्यंत सहजता से प्राप्त किया जा सकता
है। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि यदि कोई MSME योजना के बारे कोई भी जानकारी लेना चाहता है, तो उन्हें हर संभव
सहायता प्रदान की जाएगी। प्रस्तुतिकरण में पंजीकरण प्रक्रिया को सरल बनाने, बाज़ार तक पहुँच आसान कराने तथा
नवाचार और सतत विकास को प्रोत्साहित करने पर विशेष बल दिया गया। इस दौरान क्रेडिट सुविधा, सरकारी खरीद में
भागीदारी, और क्षमता निर्माण जैसी महत्त्वपूर्ण लाभों को भी रेखांकित किया गया।








