संपादकीय
शिमला 4 जुलाई
हिम नयन न्यूज़
हिमाचल प्रदेश में बरसात के साथ ही सड़कें ध्वस्त होना अब सामान्य-सा दृश्य बन गया है। पहाड़ खिसकते हैं, गाँवों का संपर्क टूटता है और जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। सवाल यह है कि आखिर इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है?
सच यह है कि अंधाधुंध पहाड़ काटकर बनाई जा रही सड़कों ने आपदा का खतरा बढ़ा दिया है। कमजोर पहाड़ी जमीन वर्षा के दबाव में खिसकने लगती है। इस पर इंजीनियरिंग की लापरवाहियाँ और ठेकेदारी तंत्र की अनियमितताएँ जोड़ दी जाएँ तो नुकसान और भी बड़ा हो जाता है।
सरकार और समाज दोनों को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा। केवल सड़क बनाना विकास नहीं है, बल्कि टिकाऊ और सुरक्षित सड़क बनाना ही असली चुनौती है। पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक मानकों को नज़रअंदाज़ करना भविष्य को खतरे में डालना है।
इसके साथ ही सरकारी तंत्र में भाई-भतीजावाद और अनुचित नियुक्तियाँ भी व्यवस्था को खोखला कर रही हैं। जब योग्य को दरकिनार कर केवल “सिफारिश” वालों को महत्व दिया जाता है, तो नतीजा अव्यवस्था और गैर-जिम्मेदारी के रूप में सामने आता है। यह प्रवृत्ति हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक सिद्ध होगी।
प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी दे रही है कि अगर अब भी नहीं संभले, तो धन-दौलत और सत्ता सब व्यर्थ साबित होंगे। ज़रूरत है ईमानदार नीतियों, योग्य मानव संसाधन और पर्यावरण के संतुलन के साथ आगे बढ़ने की।
नयना वर्मा







