सोलन 13 सितंबर
हिम नयन न्यूज़/ब्यूरो/ मनमोहन सिंह
आज मुझे डगशाई की ऐतिहासिक जेल देखने का मौका मिला। वहां जाते ही मुझे बिस्मिल अज़ीमाबादी के उस गीत की ये लाइनें मेरे होठों पर आ गईं।
“सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजू -ए- कातिल में है”
यह बात सही है कि बिस्मिल का यह गीत इंकलाबी लोगों का तराना बन कर देश भर में गूंजता रहा और आज भी इसे आंदोलनों में गया जाता है। अधिकतर लोग इसे रामप्रसाद बिस्मिल की रचना समझते हैं पर ऐसा नहीं है। इसे बिस्मिल अज़ीमाबादी ने पहली बार 1921में पढ़ा था। लेकिन डगशाई की इस जेल की दीवारों की बीच यह नगमा जज्बात बन कर न जाने कब से गूंज रहा होगा, इसकी कल्पना कि जा सकती है।

उस नग़्में के चाहे अल्फ़ाज़ अलग होंगे, भाषा अलग होगी पर जज़्बा यही था। हमारे यहां भारत की आज़ादी की लड़ाई चल रही थी तो वह यूरोप में आयरलैंड को आज़ाद कराने के लिए लोग सर धड़ की बाजी लगाए हुए थे।
जेल की दीवारें आज भी आयरलैंड में आज़ादी की लड़ाई में जुट वे 75 सैनिकों की दास्तां सुना रही हैं जो यहां लाए गए थे। उन पर आरोप था कि उन्हें ने बरतानिया की गोरी सरकार के खिलाफ बगावत की है। बिस्मिल ली ये लाइनें उन पर बिल्कुल सही उतरती हैं।
आज इस जेल को एक अजायबघर बना दिया गया है। यहां आने पर पता चलता है कि आयरलैंड के जिन 75 कैदी सैनिकों को इस जेल में लाया गया था उन पर इसी जेल में कोर्टमार्शल की कार्रवाई चली।
उनमें से अधिकतर को उम्र कैद और 27 को मौत की सज़ा सुना दी गई। लेकिन बाद में इनमें से 13 की मौत की सजा को उम्र कैद में बदल दिया गया। बाकी बचे 14 सैनिकों को जेल के पीछे गोली मार दी गई।
यहां यह बात देना भी ज़रूरी है कि आयरलैंड में चली आज़ादी की उस लड़ाई का असर भारत में चल रहे आज़ादी के आंदोलनों पर भी पड़ा। और जब जनवरी 1919 में आयरलैंड आज़ाद हो गया तो भारत के लिए भी एक उम्मीद बंध गई।
यहां आंदोलन और तेज़ हो गए। आयरलैंड क्रांति के एक नेता ईमोन डे वेलोरा महात्मा गांधी के मित्र थे। महात्मा गांधी उनके बड़े प्रशंसक भी थे। इस कारण जब महात्मा गांधी को आयरलैंड में आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले सैनिकों को डगशाई की जेल में लाया जाने की खबर मिली तो वे हालात का जायज़ा लेने खुद डगशाई आ गए। और उन्हें ने अनुरोध किया कि उन्हें भी एक रात के लिए इसी कारागार की किसी कोठड़ी में रहने दिया जाए।

महात्मा गांधी जिस कोठडी में उस रात रहे थे वह भी आज मौजूद है।
समुद्र तल से लगभग छह हजार फुट की ऊंचाई पर बसे डगशाई की यह जेल 1849 में निर्मित की गई थी।
राष्ट्रीय राजमार्ग पांच पर स्थित धर्मपुर से इस दूरी चार किलोमीटर और कुमारहट्टी से मात्र दो तीन किलोमीटर है। इसी जेल में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के भी कई पन्ने जुड़े हैं।

अपने अगले लेखों पर उन पन्नों पर भी विस्तार से नज़र डालूंगा। और बात करूंगा उन से स्थलों की जो धर्मपुर कुमारहट्टी के आसपास आठ -10 किलोमीटर के दायरे में फैले हैं।
आज सैलानियों के लिए ये आकर्षण का मुख्यकेंद्र बनते जा रहे हैं।








