सोलन 19 नवम्बर,
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो/ वर्मा
खफ़ा तुम से हुए लेकिन कभी रस्ता नहीं बदला
नहीं बदले कभी भी हम लब – ओ- लहजा नहीं बदला
हमारे साथ दुनियां ने रचाए खेल निस दिन ही
मगर हमने ज़माने से कभी रिश्ता नहीं बदला
लगे दिल पे ज़रा सी चोट तुम्हारे पास आते हैं
किसी भी हाल में हमने शफाखाना नहीं बदला
पुराना है बहुत लेकिन बुजुर्गों की निशानी है
तभी हमने कभी मां का पड़ा बक्सा नहीं बदला
उठाया है सदा घाटा दिलों के खेल में ‘दानिश’
मुनाफे के लिए हमने मगर सौदा नहीं बदला
— मनमोहन सिंह ‘दानिश’
शब्दार्थ :
लब-ओ- लहजा: बात करने का अंदाज़
शफाखाना: अस्पताल










