सोलन 8 अगस्त,
हिम नयन न्यूज़/ब्यूरो/
साभार मनमोहन सिंह
उत्तराखंड के ज़िला उत्तरकाशी के गांव धराली में इस महीने की पांच तारीख को आई तबाही का कारण बादल का फटना नहीं था।
मौसम विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार यह बाढ़ पहाड़ी चोटी पर किसी ग्लेशियर लेक के टूटने से आ सकती है। उनका कहना है कि उस दिन उस इलाके में मात्र 27 मिली मीटर बारिश रिकॉर्ड की गई इतनी सी बारिश से इस तरह की बाढ़ का आना संभव नहीं। उनका कहना है कि इस तरह की बाढ़ आने के लिए 20 से 30 किलोमीटर के इलाके में कम से कम एक घंटे में 100 मिली मीटर पानी बरसना ज़रूरी है।
मैने अपने पिछले लेख में लिखा था कि जिस तरह के “फ्लैश फ्लड” वीडियो में दिख रहे हैं वे ग्लेशियर लेक के टूट जाने से ही संभव हैं।
धराली में चल रही “चार धाम” परियोजना का अध्ययन करने के लिए सुप्रीमकोर्ट की ओर से नियुक्त समिति के अध्यक्ष रवि चोपड़ा का कहना है कि इस त्रासदी का सबसे बड़ा कारण पर्यावरण के मामले में संवेदनशील इस क्षेत्र में चार धाम परियोजना को लाना है।
उनके अनुसार यह एक ऐसा इलाका है जहां आबादी होनी ही नहीं चाहिए थी। चोपड़ा का कहना है कि चारधाम परियोजना के कारण यह इलाका एक पर्यटन स्थल बनके रह गया। जहां आबादी होनी ही नहीं चाहिए थी वहां बड़े बड़े होटल और होमस्टे तामीर हो गए।
उन्होंने कहा कि धरासू से गंगोत्री तक पहाड़ों के “स्लोप” स्थिर नहीं हैं। भूवैज्ञानिकों ने इनका अध्ययन करके एक पेपर भी छापा है जिसमें यहां के पहाड़ों की हालत का विस्तार से ज़िक्र है। एक अंग्रेज़ी अखबार में छपी खबर के मुताबिक भू वैज्ञानिकों ने धराली क्षेत्र में सड़क की चौड़ाई बढ़ाने तक पर भी रोक लगाने की ताकीद की थी।
समस्या यह है कि हमारे यहां किसी भी सरकार की वैज्ञानिक सोच नहीं है। विभाग तो बना दिए जाते हैं ग्लेशियरों और पर्यावरण का अध्ययन तो किया जाता है पर, विशेषज्ञों के सुझावों पर ध्यान नहीं दिया जाता, फिर जब केदारनाथ हो या धराली में तबाही मच जाती है तो कुछ दिन बड़ी बड़ी बातें करके उस त्रासदी को भुला दिया जाता है। जहां तक आपदा प्रबंधन की बात है तो वह हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता।
आपदा प्रबंधन का कार्यभार किसी नौकरशाह को सौंप कर सरकारें निश्चिंत हो जाती हैं। आपदा प्रबंधन के वैज्ञानिक किसी आई ए एस अफसर के नीचे काम कर रहे होते हैं। कोई भी नौकरशाह इस विषय का माहिर नहीं होता। जिलों में लोकसंपर्क विभाग को चलाना और आपदा प्रबंधन को चलाने में भरी अंतर है। बल्कि जिलों में पर्यावरण प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी किसी आपदा प्रबंधन के अधिकारी के पास हो और ज़िला प्रशासन उसके आदेशों के अनुसार काम करे। यह काम नौकरशाही के बस का नहीं।
यह आपदा केवल प्राकृतिक ही नहीं अपितु कृत्रिम भी होती है। इस पर अपने अगले लेख में बात करूंगा।









