सोलन 14 सितंबर
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो
ज़िंदगी को इस तरह अपनी बनाना चाहिए
मौत जानिब हो खड़ी तो मुस्कुराना चाहिए
रक्स तुम करते रहो चाहे बंधे हों पैर भी
ढोल की हर थाप पे बस झूम जाना चाहिए
ले मशालें हाथ में रोशन करो हर रास्ता
ज़ोर कितना है तिमिर में आज़माना चाहिए
हो उठा तूफान जब मौजें बला की तेज़ हों
ले सफ़ीना उस घड़ी लहरों में जाना चाहिए
बात माज़ी की अगर देती रहे दुख आज भी
उस तरह की बात को बस भूल जाना चाहिए
हों बला की शोखियां जिसकी निगाहें नाज़ में
उन निगाहों में सदा खुद को डुबाना चाहिए
— मनमोहन सिंह ‘दानिश’
जानिब: सामने
रक्स: नृत्य
माज़ी: भूत काल
शोखियां: चंचलता, नटखटपन








