हिमाचल प्रदेश को ज़रूरत है तीसरे विकल्प की
सोलन 18 नवंबर,
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो/मनमोहन सिंह
हिमाचल प्रदेश में पिछले कई सालों से यही चल रहा है कि एक बार बीजेपी की सरकार दूसरी बार कांग्रेस सत्ता में।
जहां तक इन दोनों दलों के क्लास कैरेक्टर की बात है तो वह एक ही है।
दोनों की आर्थिक नीतियों में कोई अंतर नहीं। फर्क बस इतना है कि कभी कांग्रेस के कार्यकर्ता सत्ता के गलियारों में दिखते हैं कभी बीजेपी के लोग वहां बैठे नज़र आते हैं।
दोनों दलों की नीतियां एक दूजे को माफिक आती हैं। अगर शांता कुमार “नो वर्क नो पे” ले कर आते हैं तो वीरभद्र सिंह उसको जारी रखते हैं।

कांग्रेस के जो लोग “नो वर्क नो पे” के खिलाफ शोर मचा रहे होते, वीरभद्र सिंह के सत्ता में आते ही खामोश हो जाते। क्योंकि वीरभद्र सिंह भी उसे जारी रखते हैं।
तीसरी ताकत के तौर पर वामपंथी दल कभी कबार अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं। पर उनका काम शिमला क्षेत्र तक सीमित है। उसमें भी सीपीआई (एम) अधिक नज़र आती है।
वैसे कामरेड राकेश सिंघा प्रदेश के बड़े नेताओं में गिने जा सकते हैं। जहां तक सीपीई की बात है तो उसका मुख्य काम बिलासपुर और सोलन ज़िला के नालागढ़ क्षेत्र में नज़र आता है। लेकिन ये दल फिलहाल एक विकल्प के रूप में स्थापित नहीं हो पाए हैं।
आम आदमी पार्टी की पैठ यहां नहीं के बराबर है। इस पार्टी ने एक दो बार कोशिश की है पर ऐसा लगता है कि पार्टी के सुपरीमो अरविंद केजरीवाल की यहां अधिक रुचि नहीं है।
कुछ साल पहले बीजेपी से निकले मोहिंदर नाथ सोफत जैसे लगभग दो सौ लोग भी इससे जुड़े थे पर केजरीवाल ने हिमाचल में कोई रुचि नहीं दिखाई या उन्हें यहां कोई जमीन नजर नहीं आई।
नतीजा यह रहा कि बीजेपी अपने अधिकतर लोगों को वापिस ले जाने में सफल रही।
इस तरह देखा जाए तो हिमाचल प्रदेश में अगर कोई तीसरा विकल्प कभी बनता और सफल होता है तो वह सीपीई और सीपीई (एम) ही मिल कर बना सकते हैं।
इन दोनों दलों का ट्रेड यूनियन और किसानों में काफी काम है। छात्रों में भी एस एफ आई का भी अच्छा प्रभाव है।
ज़रूरत है इन संगठनों से पार्टी कैडर को निकालने की। लोग तीसरा विकल्प चाहते हैं वे तैयार हैं, पर क्या प्रदेश के वामपंथी दल यह विकल्प देने के लिए तैयार हैं?
इन दोनों दलों को अपनी सोच का दायरा बढ़ाना पड़ेगा। उन्हें यह मान कर चलना होगा कि वे प्रदेश में तीसरा विकल्प हैं, न कि जाने अनजाने में सत्ताधारी पार्टियों के लिए जमीन तैयार करके देना।







