/हिमाचल में राजनीतिक अस्थिरता के बीच तीसरे विकल्प की ओर बढ़ती नजरें

हिमाचल में राजनीतिक अस्थिरता के बीच तीसरे विकल्प की ओर बढ़ती नजरें

शिमला 16 दिसम्बर
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो /वर्मा


हिमाचल प्रदेश में मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता और लगातार बढ़ती खींचतान के बीच अब आमजन और राजनीतिक हलकों की नजरें एक संभावित तीसरे विकल्प की ओर उठने लगी हैं। हाल ही में सरकार के मंडी कार्यक्रम के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की मुलाकातों ने इस चर्चा को और हवा दे दी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में रामविलास पासवान के बाद उनके पुत्र चिराग पासवान द्वारा अपनाए गए मॉडल की तर्ज पर हिमाचल में भी किसी नए राजनीतिक मंच को आकार दिए जाने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि, यह भी सच है कि हिमाचल प्रदेश में इससे पूर्व हिमाचल विकास पार्टी जैसे प्रयोगों को सीमित समर्थन तो मिला, लेकिन किसी बड़े राजनीतिक विकल्प के रूप में वे स्थापित नहीं हो पाए।

इसके बावजूद वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा और कांग्रेस—दोनों ही दल आंतरिक असंतोष और आपसी खींचतान से जूझते नजर आ रहे हैं, जिससे राजनीतिक शून्य की स्थिति बनती प्रतीत हो रही है।

राज्य में आम आदमी पार्टी अब तक अपनी ठोस राजनीतिक पकड़ बनाने में सफल नहीं हो पाई है। ऐसे में दोनों प्रमुख दलों से असंतुष्ट नेताओं द्वारा किसी साझा तीसरे मंच के गठन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि यह असंतोष संगठित रूप लेता है, तो आने वाले समय में यह प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।

हिमाचल की राजनीति में कर्मचारी वर्ग की भूमिका हमेशा से निर्णायक रही है। आगामी विधानसभा चुनावों में भी यह वर्ग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

हालांकि इस बार कर्मचारियों के लिए किसी एक का समर्थन/चुनाव करना अपने आप में चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। कांग्रेस ने ओपीएस (पुरानी पेंशन योजना) लागू कर कर्मचारियों का समर्थन हासिल किया है, जबकि भाजपा का इस विषय पर अलग दृष्टिकोण रहा है।

यदि भविष्य में राजनीतिक समीकरण बदले और कर्मचारियों का समर्थन भाजपा को मिलता है तथा ओपीएस पर पुनर्विचार होता है, तो यह एक नया और जटिल राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

कर्मचारी वर्ग अपने हितों के विरुद्ध कोई कदम उठाने से परहेज करेगा, ऐसे में तीसरे विकल्प की संभावना और मजबूत होती दिखाई देती है।

उधर, कांग्रेस के भीतर ‘हॉली लॉज’ को लेकर उपेक्षा के आरोप भी पार्टी के लिए आंतरिक असंतोष का कारण बनते नजर आ रहे हैं, जो आगे चलकर संगठनात्मक विघटन की स्थिति पैदा कर सकते हैं।

कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। क्या राज्य में वास्तव में कोई प्रभावी तीसरा विकल्प उभर पाएगा, या फिर पारंपरिक दल ही स्थिति को संभाल लेंगे—इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।