/बात फुटबॉल और रहीम साहब की: रणनीति, संघर्ष और ऐतिहासिक जीत

बात फुटबॉल और रहीम साहब की: रणनीति, संघर्ष और ऐतिहासिक जीत

सोलन 17 दिसम्बर ,
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो/ मनमोहन सिंह

भारतीय फुटबॉल के स्वर्णिम दौर के शिल्पकार सैयद अब्दुल रहीम की रणनीतिक प्रतिभा और अदम्य इच्छाशक्ति आज भी खेल प्रेमियों को प्रेरित करती है। उनके जीवन पर बनी फिल्म ‘मैदान’ के माध्यम से एक बार फिर यह चर्चा में है कि किस तरह सीमित संसाधनों, बीमारी और संस्थागत उदासीनता के बावजूद रहीम साहब ने भारतीय फुटबॉल को एशिया के शिखर तक पहुंचाया।

1962 के जकार्ता एशियाई खेलों में भारत की ऐतिहासिक सफलता रहीम साहब की दूरदर्शी सोच का परिणाम थी। उस दौर में जहां टीम चयन का केंद्र केवल बंगाल तक सीमित था, वहीं रहीम साहब ने पूरे देश में प्रतिभाओं की तलाश की। सिकंदराबाद से तुलसीदास बलराम, हैदराबाद से गोलकीपर पीटर थंगराज, जरनैल सिंह और चुन्नी गोस्वामी जैसे खिलाड़ियों को राष्ट्रीय टीम में शामिल कर उन्होंने विरोध के बावजूद एक मजबूत टीम खड़ी की।

वित्तीय संकट के बीच, जब फेडरेशन और वित्त मंत्रालय ने सहयोग से इनकार किया, तब रहीम साहब ने तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई से मिलकर शर्तों के साथ टीम के लिए संसाधन जुटाए। जकार्ता पहुंचने पर टीम को शुरुआती झटके भी लगे—गोलकीपर पीटर थंगराज के घायल होने और कोरिया से शुरुआती हार के बावजूद, रहीम साहब ने खिलाड़ियों की पोजीशन बदलकर थाईलैंड और जापान के खिलाफ निर्णायक जीत दिलाई।

वियतनाम और फाइनल मुकाबलों में उनकी रणनीतिक चालें निर्णायक साबित हुईं। जरनैल सिंह को सेंटरफॉरवर्ड और अरुण घोष को सेंटर बैक में उतारना, तथा 4-2-4 फॉर्मेशन अपनाना—इन प्रयोगों ने इतिहास रच दिया। फाइनल में पी.के. बनर्जी और जरनैल सिंह के गोलों से भारत ने कोरिया को 2-1 से हराकर स्वर्ण पदक जीता। आज विश्व फुटबॉल में प्रचलित 4-2-4 फॉर्मेशन को भी रहीम साहब की देन माना जाता है।

उस ऐतिहासिक फाइनल को याद करते हुए टीम के जुझारू खिलाड़ी अरुण घोष बताते हैं कि एक लाख दर्शकों से भरे स्टेडियम में भारत के खिलाफ माहौल था, लेकिन पाकिस्तानी हॉकी टीम भारत के समर्थन में आवाज़ बुलंद कर रही थी। जीत के बाद भले ही कोई बधाई देने न आया हो, लेकिन वह जीत और वह जश्न आज भी खिलाड़ियों के दिलों में जीवित है।

भारतीय फुटबॉल के इतिहास में सैयद अब्दुल रहीम केवल एक कोच नहीं, बल्कि रणनीति, साहस और विश्वास का प्रतीक हैं—जिनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।