/बढ़ते आवासीय बहुमंजिले सोसाइटीज से जन-जीवन पर पड़ता असर

बढ़ते आवासीय बहुमंजिले सोसाइटीज से जन-जीवन पर पड़ता असर

बेंगलुरु 4 फरवरी,
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो/ वर्मा

भारत में तेजी से बढ़ता शहरीकरण और उसके साथ उभरती आवासीय बहुमंजिले सोसाइटीज आज के समय की एक प्रमुख सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता बन चुकी हैं। गांवों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन, रोजगार और बेहतर जीवन-स्तर की तलाश ने शहरों का तेजी से विस्तार किया है।

इसी विस्तार का प्रत्यक्ष परिणाम है ऊंची-ऊंची इमारतों और घनी आवासीय सोसाइटीज का निर्माण है। हालांकि यह विकास आधुनिकता का प्रतीक है, लेकिन इसके प्रभाव जन-जीवन पर बहुआयामी और गहरे हैं।

पहले जहां मोहल्लों और गलियों में आपसी मेल-मिलाप, सहयोग और सामुदायिक भावना प्रबल थी, वहीं बहुमंजिले सोसाइटीज में जीवन अपेक्षाकृत एकाकी होता जा रहा है। लोग एक ही इमारत में रहते हुए भी एक-दूसरे को ठीक से नहीं जानते। सामाजिक रिश्तों में औपचारिकता बढ़ी है और आत्मीयता कम होती जा रही है।

तेजी से हो रहे निर्माण कार्यों ने हरित क्षेत्रों को काफी हद तक कम कर दिया है। पेड़ों की कटाई, कंक्रीट का बढ़ता उपयोग और वाहनों की संख्या में वृद्धि से वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। “कंक्रीट के जंगल” शहरों को गर्म बना रहे हैं, जिससे जलवायु संतुलन प्रभावित हो रहा है।

बहुमंजिले सोसाइटीज के कारण पानी, बिजली, सीवरेज, सड़कों और यातायात व्यवस्था पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है। कई शहरों में पानी की किल्लत, ट्रैफिक जाम और कचरा प्रबंधन जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले चुकी हैं। नियोजन की कमी के कारण सुविधाएं जनसंख्या के अनुपात में विकसित नहीं हो पा रही हैं।

इन सोसाइटीज ने रियल एस्टेट को बढ़ावा दिया है और रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। हालांकि, इसके साथ-साथ आवास की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जिससे मध्यम और निम्न वर्ग के लिए शहरों में घर खरीदना या किराए पर लेना मुश्किल होता जा रहा है।

सीमित खुले स्थान, बच्चों के खेलने की जगहों की कमी और व्यस्त जीवन-शैली के कारण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।

तनाव, अवसाद और जीवन-शैली से जुड़ी बीमारियां शहरी समाज में आम होती जा रही हैं।

दूसरी ओर, बहुमंजिले सोसाइटीज में सुरक्षा, आधुनिक सुविधाएं, पार्किंग, लिफ्ट, सामुदायिक हॉल जैसी व्यवस्थाएं लोगों को सुविधा प्रदान करती हैं। यह शहरी जीवन को व्यवस्थित और सुरक्षित भी बनाती हैं।

बढ़ती आवासीय बहुमंजिले सोसाइटीज और शहरीकरण विकास की आवश्यकता हैं, लेकिन यह तभी सार्थक होंगे जब संतुलित शहरी नियोजन, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता पर समान रूप से ध्यान दिया जाए। यदि विकास के साथ मानवीय और पर्यावरणीय पक्षों की अनदेखी हुई, तो इसका दुष्प्रभाव आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है।