शिमला 18 फरबरी,
हिम नयन न्यूज/ ब्यूरो/ वर्मा
भारत में बदलते सामाजिक ढांचे के साथ लिव-इन रिलेशन और दहेज जैसे विषयों पर लेखन तेजी से बढ़ा है। अखबारों, ब्लॉग और सोशल मीडिया पर कई लेखक इन्हें आधुनिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा वर्ग यह सवाल भी उठा रहा है कि क्या यह लेखन समाज को सही दिशा दे रहा है या बिना आत्मनिरीक्षण के नई दुविधाएँ पैदा कर रहा है।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि भारत जैसे पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्यों वाले देश में रिश्तों को हमेशा सामाजिक जिम्मेदारी के साथ जोड़ा गया है। विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का संबंध माना जाता है।
ऐसे में जब कुछ लेखक लिव-इन रिलेशन को बिना सामाजिक और नैतिक पहलुओं पर गहराई से विचार किए “आसान विकल्प” के रूप में प्रस्तुत करते हैं, तो समाज के एक हिस्से को यह दिशा-भटकाव जैसा लगता है।
आलोचकों का कहना है कि कई लेखों में लिव-इन रिलेशन को केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के चश्मे से देखा जाता है, जबकि इसके सामाजिक और कानूनी जोखिमों पर कम चर्चा होती है।
रिश्तों में अस्थिरता, भावनात्मक असुरक्षा, और कानूनी विवादों जैसे पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है। कुछ मामलों में संबंध टूटने के बाद कानूनी प्रावधानों के दुरुपयोग और ब्लैकमेल जैसे आरोप भी सामने आते रहे हैं, जिससे समाज में भ्रम और अविश्वास का माहौल बनता है।
दहेज प्रथा पर लिखे जाने वाले लेखों को लेकर भी यही सवाल उठता है। दहेज एक गंभीर सामाजिक बुराई है और इसके खिलाफ लिखना बेहद जरूरी है। लेकिन जब लेखक केवल आलोचना तक सीमित रह जाते हैं और व्यावहारिक समाधान या व्यक्तिगत उदाहरण पेश नहीं करते, तो समाज में यह संदेश जाता है कि लेखन केवल विचारों तक सीमित है, व्यवहार तक नहीं।
यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या लेखक अपने विचारों को अपने निजी जीवन में भी अपनाते हैं? समाज का एक वर्ग मानता है कि सामाजिक सुधार का संदेश तभी प्रभावी होता है जब वह लेखन के साथ-साथ जीवन में भी दिखाई दे। केवल सिद्धांतों की बात करना आसान है, लेकिन उन्हें अपने परिवार और जीवन में लागू करना ही असली बदलाव का संकेत है।
इस पूरे विमर्श का निष्कर्ष यह है कि लिव-इन रिलेशन और दहेज जैसे विषयों पर संतुलित और जिम्मेदार लेखन की जरूरत है। न तो अंधाधुंध विरोध समाधान है और न ही बिना आलोचनात्मक दृष्टि के समर्थन।
समाज को दिशा देने के लिए जरूरी है कि लेखक स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी, अधिकारों के साथ कर्तव्यों और आधुनिकता के साथ भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं का संतुलन प्रस्तुत करें।
समाज सुधार केवल शब्दों से नहीं, बल्कि शब्द और व्यवहार के मेल से आता है। जब लेखन आत्मनिरीक्षण और जिम्मेदारी के साथ होगा, तभी वह समाज को सही दिशा दे सकेगा।









