/हाईकोर्ट के निर्देशों से PGIMER के गरीब मरीज कल्याण कोष में 179% की ऐतिहासिक वृद्धि।

हाईकोर्ट के निर्देशों से PGIMER के गरीब मरीज कल्याण कोष में 179% की ऐतिहासिक वृद्धि।

चंडीगढ़, 24 फरवरी ,
हिम नयन न्यूज/ ब्यूरो/ वर्मा

Punjab and Haryana High Court द्वारा डिफॉल्टर पक्षों पर लगाए गए जुर्माने और लागत को Postgraduate Institute of Medical Education and Research (PGIMER) के गरीब मरीज कल्याण कोष (PPWF) में जमा कराने के निर्देशों से कोष में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

पिछले दो वर्षों में इस मद में प्राप्त राशि में 179 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो न्यायपालिका और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के बीच सकारात्मक समन्वय का सशक्त उदाहरण है।

आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2023–24 में जहां कोष में ₹89,50,046 की राशि प्राप्त हुई थी, वहीं वित्तीय वर्ष 2024–25 में यह बढ़कर ₹2,49,58,440 हो गई।

वर्तमान वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल 2025 से 31 जनवरी 2026) में अब तक ₹2,06,91,689 की राशि प्राप्त हो चुकी है, जो इस पहल की निरंतर प्रभावशीलता को दर्शाती है।

निदेशक, PGIMER Vivek Lal, ने न्यायपालिका के इस मानवीय दृष्टिकोण के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक न्यायिक आदेश अब जरूरतमंद परिवारों के लिए उपचार, राहत और नई आशा का माध्यम बन रहा है।

उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी के कठिन समय में भी न्यायालय के हस्तक्षेप और निर्देशों ने संस्थान की स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
निदेशक ने बताया कि कोष में हुई वृद्धि से संस्थान की क्षमता में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, जिससे ऑन्कोलॉजी, कार्डियोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, नेफ्रोलॉजी और ट्रॉमा जैसे गंभीर विभागों में आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को समय पर सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।

यह सहायता उन मरीजों के लिए जीवनरेखा सिद्ध हो रही है, जो किसी सरकारी स्वास्थ्य योजना या बीमा कवरेज के अंतर्गत नहीं आते।

गरीब मरीज कल्याण कोष के माध्यम से पात्र लाभार्थियों को आवश्यक दवाइयां, उच्च स्तरीय जांच, सर्जिकल उपभोग्य सामग्री, इम्प्लांट तथा आपातकालीन उपचार उपलब्ध कराया जाता है, ताकि आर्थिक अभाव के कारण उपचार बाधित न हो। यह कोष एक पारदर्शी और सुव्यवस्थित प्रक्रिया के तहत संचालित किया जाता है, जिससे सहायता वास्तविक जरूरतमंदों तक शीघ्र और प्रभावी रूप से पहुंच सके।

PGIMER का यह प्रयास दर्शाता है कि न्यायिक जवाबदेही और जनस्वास्थ्य सेवाओं के बीच समन्वय किस प्रकार सामाजिक सरोकारों को सशक्त बना सकता है और जरूरतमंदों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला सकता है।