/हिमाचल में आर्थिक दबाव गहराया, क्या लग सकता है वित्तीय आपातकाल ?

हिमाचल में आर्थिक दबाव गहराया, क्या लग सकता है वित्तीय आपातकाल ?

शिमला 27 मार्च 2026
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो/ वर्मा

हिमाचल प्रदेश में सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार इस समय आर्थिक दबाव, नीतिगत बदलावों और बढ़ते राजनीतिक विवादों के बीच घिरी हुई है। वर्ष 2026-27 के लिए करीब ₹54,928 करोड़ का बजट पेश किया गया है, लेकिन बढ़ते राजस्व घाटे और केंद्र से मिलने वाली ग्रांट में कमी ने राज्य की वित्तीय स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

इसी बीच विपक्ष ने प्रदेश में वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency) जैसे हालात बनने की आशंका जताते हुए इस दिशा में चर्चा तेज कर दी है।

हालांकि, संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि वित्तीय आपातकाल लागू करना एक अत्यंत दुर्लभ और अंतिम विकल्प होता है, जिसके लिए केंद्र सरकार और राष्ट्रपति स्तर पर विशेष परिस्थितियों का आकलन जरूरी होता है।

सरकार ने खर्चों पर नियंत्रण के लिए कई सख्त कदम उठाए हैं, जिनमें योजनाओं में कटौती, पदों की समीक्षा और वित्तीय अनुशासन लागू करना शामिल है। साथ ही सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक कल्याण योजनाओं को प्राथमिकता देने का दावा कर रही है।

दूसरी ओर, विपक्ष के नेता जयराम ठाकुर लगातार सरकार पर हमलावर हैं। उनका आरोप है कि सरकार जनहित की योजनाओं को बंद कर रही है और हिम केयर जैसी योजनाओं को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है।

प्रदेश में पेट्रोल-डीजल पर संभावित सेस, बढ़ती महंगाई, नशे के मामलों में वृद्धि और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी हुई है।

सरकार जहां सुधार और आत्मनिर्भरता की दिशा में काम करने का दावा कर रही है, वहीं विपक्ष इसे वित्तीय कुप्रबंधन का परिणाम बता रहा है।

भारत के संविधान का अनुच्छेद 360 देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान करता है। यह तब लागू किया जाता है जब देश या किसी राज्य की वित्तीय स्थिरता या साख को गंभीर खतरा हो। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार राज्य के वित्तीय मामलों पर व्यापक नियंत्रण स्थापित कर सकती है, जिसमें वेतन कटौती, खर्चों पर नियंत्रण और वित्तीय निर्णयों की निगरानी शामिल होती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, फिलहाल हिमाचल में आर्थिक दबाव जरूर है, लेकिन संवैधानिक रूप से वित्तीय आपातकाल लागू होने की संभावना अभी कम मानी जा रही है। यह कदम अब तक देश में कभी लागू नहीं हुआ है और इसे अंतिम विकल्प के रूप में ही देखा जाता है।

राज्य सरकार द्वारा उठाए जा रहे सुधारात्मक कदम और केंद्र के साथ समन्वय इस स्थिति को संभालने में अहम भूमिका निभाएंगे।