“ईमानदारी” के बोझ तले दबे अफसर और ‘गरीब’ बिल्डर्स की दर्दभरी कहानी।
शिमला/सोलन, 1 अप्रैल
हिम नयन न्यूज़ / विशेष/ मनमोहन शर्मा
कहते हैं कि इस दुनिया में सबसे बड़ा दुख क्या है? अगर आप सोच रहे हैं गरीबी, बेरोजगारी या महंगाई—तो जनाब, आप गलत हैं। असली दुख है… “दूसरों की जलन”।
अब देखिए न, एक सीधे-साधे नौकरशाह को ससुराल से 40-45 किलो सोना क्या मिल गया, लोग उसके पीछे ही पड़ गए। भ्रष्टाचार के आरोप, जांच, सवाल-जवाब—जैसे उसने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो! अरे भाई, क्या उसने कभी किसी से पूछा कि तुम्हारी संपत्ति कहां से आई? नहीं ना? तो फिर लोग उसकी निजी “खुशहाली” से इतना परेशान क्यों हैं?

वैसे भी, बड़ा अफसर बनना कोई आसान काम थोड़ी है। सालों की मेहनत, अनगिनत “निवेश” और फिर जाकर यह मुकाम मिलता है। अब अगर कोई अपनी उस इन्वेस्टमेंट को ब्याज समेत वसूल ले, तो इसमें गलत क्या है? आखिर “मेहनत” का फल तो मिलना ही चाहिए!
पंजाब के एक पूर्व मंत्री का उदाहरण भी याद आता है—मंत्री बनते ही कई गाड़ियां खरीद लीं। जब पत्रकारों ने सवाल किया तो उन्होंने साफ कहा, “मैं मंत्री हूं, क्या गाड़ियों की जगह तांगे रखता?” बात तो सौ फीसदी सही है। पद बड़ा, तो शौक भी बड़े।
इसी कड़ी में सोलन के कुछ “गरीब” बिल्डर्स का जिक्र भी जरूरी है। बेचारे लोकभलाई के लिए फ्लैट बना रहे थे, लोगों को करोड़ों के “सस्ते” घर देने का सपना देख रहे थे। अब अगर जमीन अपने नाम पर नहीं ले पाए और किसी और के नाम पर ले ली, तो उसे बेनामी कहना क्या न्याय है? पैसा तो उनका ही था, बस नाम उधार लिया गया—इतनी सी बात पर इतना हंगामा!
जहां देश में लोग अरबों का कर्ज लेकर गायब हो जाते हैं और बाद में माफी भी मिल जाती है, वहां इस तरह की “छोटी-मोटी” बातों को मुद्दा बनाना समझ से परे है।
कुछ कलम घसीट और एक-दो व्हिसलब्लोअर जरूर शोर मचाएंगे, लेकिन जब पूरी व्यवस्था खामोश समर्थन दे दे, तो भला कौन क्या कर सकता है?
इसलिए इस “बेचारे” अफसर और “मासूम” बिल्डर्स के लिए यही दुआ है कि वे इस मुश्किल दौर से जल्द बाहर निकलें—ताकि समाज सेवा का उनका पवित्र कार्य यूं ही चलता रहे।









