आस्था, अंधभक्ति और अपराध के बीच उलझता संत समाज का चेहरा
सोलन, 2 अप्रैल।
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो/मनमोहन सिंह
देश में स्वयंभू बाबाओं और तथाकथित धार्मिक गुरुओं पर लगातार सामने आ रहे गंभीर आरोपों ने समाज को एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है। व्यंग्यात्मक अंदाज में प्रस्तुत यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि समाज में बढ़ती अंधभक्ति और नैतिक गिरावट को भी उजागर करती है।
विडंबना यह है कि जिन लोगों को समाज आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानता है, वे ही कई बार हत्या, दुष्कर्म और अन्य आपराधिक मामलों में संलिप्त पाए जाते हैं। इसके बावजूद उनके अनुयायी उन्हें निर्दोष मानते हुए समर्थन करते हैं, जिससे न्याय प्रक्रिया और सामाजिक चेतना दोनों प्रभावित होती हैं।
धार्मिक आस्था के नाम पर कई बाबाओं को वीआईपी सुविधाएं मिलना, जेल से बाहर आने पर सार्वजनिक सम्मान मिलना और राजनीतिक समर्थन प्राप्त होना, इस प्रवृत्ति को और भी चिंताजनक बनाता है। इससे यह संदेश जाता है कि प्रभावशाली लोगों के लिए कानून के मायने अलग हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि समाज में जागरूकता की कमी और अंधविश्वास के चलते ऐसे मामलों में पीड़ितों को न्याय मिलने में कठिनाई होती है। साथ ही, कुछ लोग धार्मिक भावनाओं का दुरुपयोग कर व्यक्तिगत लाभ उठाने में सफल हो जाते हैं।
यह व्यंग्यात्मक प्रस्तुति दरअसल एक गंभीर संदेश देती है कि समाज को अब आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। आस्था और अंधभक्ति के बीच की रेखा को समझते हुए, कानून का समान रूप से पालन सुनिश्चित करना समय की मांग है, ताकि ऐसे मामलों में दोषियों को संरक्षण न मिल सके।








