सोलन 8 सितम्बर
हिम नयन न्यूज /ब्यूरो/ साभार मनमोहन सिंह
हॉकी का फाइनल मैच अभी शुरू ही हुआ था, लोग अपनी अपनी सीटों पर बैठ रहे थे, कोरिया के खिलाड़ी हॉकी स्टिक्स को संभाल रहे थे कि हरमनप्रीत के पास को सुखजीत ने कोरिया की डी में संभाला और इससे पहले कि कोरियाई गोल रक्षक कुछ समझ पाता सुखजीत ने गेंद उनके की गोलपोस्ट में डाल दी (1-0)।
उस समय मैच शुरू हुए मात्र 30 सेकंड्स ही हुए थे।
इतनी जल्दी गोल की उम्मीद तो खुद फुल्टोन की इस भारतीय टीम ने भी नहीं की होगी।
कोरिया की हालत और खराब हो गई होती अगर जुगराज ने पेनल्टी स्ट्रोक को गोल में बदल दिया होता।
भारत निश्चित रूप से बेहतर टीम थी। मेजबान टीम के लिए दूसरा गोल दिलप्रीत की स्टिक से आया। कुछ दिन पहले तक अपनी फॉर्म की तलाश कर रहे दिलप्रीत ने आज कमाल का खेल दिखाया।
दूसरे क्वार्टर के अंतिम मिनट में संजय को एक लंबा पास मिला और संजय ने बड़ी चतुराई से गेंद दिलप्रीत को सरका दी जो बिल्कुल कोरिया के गोल रक्षक के सामने खड़े थे। दिलप्रीत ने गेंद आराम से गोल में पहुंचाने में कोई गलती नहीं की (2-0)।
हॉफ टाइम के बाद भी खेल पर भारत की पकड़ रही। तीसरे क्वार्टर अंतिम मिनट में फिर दिलप्रीत ने शानदार प्रदर्शन किया। राजकुमार पॉल से मिले पास पर दिलप्रीत ने अपना दूसरा और टीम का तीसरा गोल बनाया (3-0)।
भारत का चौथा गोल अमित रोहिदास ने पेनल्टी कॉर्नर पर किया।
हालांकि भारत की जीत पर कोई संदेह नहीं था, देखना था कितने गोल करती है यह टीम।

पूरे मैच में कभी भी भारत कहीं दवाब में नहीं दिखा। अगर भारत ने एक पेनल्टी स्ट्रोक और गोल करने के एक दो मौके न गंवाए होते तो उनकी जीत आधा दर्जन गोलों से हुई होती।
इस जीत के साथ भारत अगले साल बेल्जियम और नीदरलैंड्स में होने वाले विश्व कप में प्रवेश कर गया।
एशिया कप हॉकी में भारत की यह चौथी जीत है। इससे पूर्व 2003, 2007 और 2017 में भी भारत यह कप जीत चुका है।
इसके अलावा कोरिया इसे पांच बार और पाकिस्तान तीन बार इसे जीत चुके हैं।
विश्वकप 2026:
भारत की असली परीक्षा अगले साल होने वाले विश्व कप में होगी।
यूरोप और लेटिन अमेरिकन देश बहुत शानदार हॉकी खेल रहे हैं। इस जीत के बावजूद भारत को अपनी कमजोरियों को दूर करना होगा। वहां आप गोल करने का एक भी अवसर खो नहीं सकते। हमें अपने पेनल्टी कॉर्नर्स में सुधार लाने की जरूरत है।
पिछले ओलंपिक में हमने देखा कि यूरोपीय टीमें पेनल्टी कॉर्नर के समय एक की जगह दो फ्रंट रशर भेजती थी और भारत उसका तोड़ नहीं ढूंढ पाया था।
हालांकि दो रशर भेजने का अर्थ है कि डी टॉप और गोल पोस्ट के बीच गोलरक्षक को छोड़ दो ही रक्षक रह जाते हैं। उन देशों की इस कमज़ोरी का लाभ कैसे उठाया जाए यह टीम के मुख्य कोच फुल्टन को सोचना होगा। देखते हैं कि क्या भारत 1975 के बाद यानी 51 साल बाद विश्वकप जीत पाता है।
खैर फिलहाल इस जीत के लिए सभी देशवासियों को बधाई।










