“रिश्वत लेते पकड़ा गया, रिश्वत दे कर बच जाएगा।” ऐसी धारणाएँ समाज के लिए घातक
शिमला 16 दिसम्बर,
हिम नयन न्यूज़ ब्यूरो /एजेंसी
सरकारी तंत्र किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ होता है। नीति निर्माण सरकारों का कार्य है, लेकिन उन नीतियों को ज़मीनी स्तर पर लागू करने की जिम्मेदारी सरकारी कर्मचारियों पर होती है। यदि सरकारें अपने ही कर्मचारियों के प्रति तिरस्कार का भाव रखें या राजनेता उन्हें केवल आदेश पालन की मशीन समझें, तो इसका दुष्प्रभाव केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धीरे-धीरे पूरे समाज को अपनी चपेट में ले लेता है।
हाल ही में एक फॉरेस्ट गार्ड को 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए पकड़े जाने का मामला केवल एक व्यक्ति विशेष का अपराध नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की विफलता की ओर भी संकेत करता है, जिसमें ईमानदारी कमजोर और भ्रष्टाचार सामान्य व्यवहार बनता जा रहा है। इससे भी अधिक चिंताजनक वह मानसिकता है, जो समाज में अब कहावत का रूप लेती जा रही है— “रिश्वत लेते पकड़ा गया, रिश्वत दे कर बच जाएगा।” ऐसी धारणाएँ इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि जनता का भरोसा व्यवस्था और न्याय प्रक्रिया दोनों से डगमगाने लगा है।

जब समाज यह मानने लगे कि कानून केवल दिखावे के लिए है और पैसा हर रास्ता खोल सकता है, तब यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं रहती, बल्कि नैतिक पतन का गंभीर रूप बन जाती है। यह सोच अपने आप में उस भ्रष्ट तंत्र की ओर इशारा करती है, जिसमें दोषी को सज़ा मिलने से अधिक उसके बच निकलने की संभावनाओं पर विश्वास किया जाता है।
सरकारों का दायित्व केवल विकास योजनाएँ बनाना और आँकड़ों में प्रगति दिखाना नहीं है, बल्कि समाज में समरसता, विश्वास और न्याय की भावना को बनाए रखना भी है। जब सरकारी कर्मचारियों को सम्मान, सुरक्षा और निष्पक्ष कार्य-परिस्थितियाँ नहीं मिलतीं, और जब राजनीतिक दबाव में उनसे नियमों के विपरीत कार्य करवाए जाते हैं, तब उनके मन में वाङ्मस्य और असंतोष पनपता है। यही असंतोष आगे चलकर समाज के लिए घातक सिद्ध होता है।

आज गंभीरता से यह प्रश्न पूछने की आवश्यकता है कि सरकारी दफ्तरों में काम करवाने की एवज में रिश्वत की माँग क्यों की जाती है। क्या यह केवल व्यक्तिगत लालच का परिणाम है, या फिर इसके पीछे कमज़ोर व्यवस्था, राजनीतिक हस्तक्षेप, जवाबदेही की कमी और ईमानदार कर्मचारियों की अनदेखी भी जिम्मेदार है? जब ईमानदारी को संरक्षण नहीं मिलता और गलत कार्यों पर मौन सहमति बन जाती है, तब भ्रष्टाचार केवल फैलता ही नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकृति भी प्राप्त कर लेता है।
समय की मांग है कि सरकारें आत्ममंथन करें। अपने कर्मचारियों को केवल दोषी ठहराने के बजाय उनकी वास्तविक समस्याओं को समझें, उन्हें सम्मानजनक कार्य-परिस्थितियाँ प्रदान करें और राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर निष्पक्ष रूप से काम करने का वातावरण तैयार करें। साथ ही, भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई केवल दिखावटी न होकर ऐसी हो, जिससे “पकड़ा गया तो बच जाएगा” जैसी कहावतें समाज से हमेशा के लिए समाप्त हों।
यदि सरकार, प्रशासन और समाज तीनों मिलकर अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाएँ, तभी व्यवस्था में विश्वास बहाल होगा। अन्यथा, तंत्र के भीतर पनपता असंतोष, भ्रष्टाचार और अविश्वास समाज की पीड़ा को और अधिक गहरा करता चला जाएगा।









