नई दिल्ली 21 जनवरी
हिम नयन न्यूज़/ब्यूरो/वर्मा
डिजिटल युग में जहां समाचार उपभोग की दिशा पूरी तरह बदल चुकी है, वहीं कुछ बड़े पब्लिकेशन हाउस आज भी झूठे और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए आंकड़ों के सहारे सरकारी विज्ञापन बजट पर कब्जा जमाए हुए हैं यह सवाल कई मंचों पर उठने लगा है।
यह खेल वर्षों से चला आ रहा है और इसके कारण न केवल सरकारी खजाने को नुकसान हो रहा है, बल्कि पत्रकारिता की साख भी लगातार कमजोर पड़ती जा रही है।पंजाब सरकार द्वारा इस पर थोड़ा सा अपना रुख साफ करने पर कई राजनीतिक पार्टियों ने भी मोर्चा संभाल लिया था ।

मीडिया विशेषज्ञों के अनुसार, प्रिंट मीडिया का वास्तविक सर्कुलेशन लगातार गिर रहा है, लेकिन कागजों में दर्शाए जाने वाले आंकड़े अब भी करोड़ों पाठकों तक पहुंच का दावा करते हैं। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर केंद्र और राज्य सरकारें आज भी करोड़ों रुपये का विज्ञापन बजट ऐसे मीडिया हाउसों को आवंटित कर रही हैं, जिनकी जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है।
सूत्रों का कहना है कि कई प्रकाशन संस्थान सर्कुलेशन ऑडिट, वितरण रिपोर्ट और पाठक संख्या से जुड़े आंकड़ों में हेरफेर कर सरकारी एजेंसियों के सामने प्रभावशाली छवि प्रस्तुत करते हैं। चूंकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है, इसलिए यह खेल लंबे समय से बिना किसी ठोस विरोध के चलता आ रहा है।
डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बावजूद, सरकारी विज्ञापन नीतियां आज भी बड़े पैमाने पर पुराने प्रिंट मीडिया ढांचे पर आधारित हैं। परिणामस्वरूप, वास्तविक पाठक न होने के बावजूद कुछ पब्लिकेशन हाउस केवल सरकारी विज्ञापनों के सहारे अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं और करोड़ों रुपये का बजट हड़प रहे हैं।
मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति केवल आर्थिक अनियमितता का मामला नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है। जब सूचना का माध्यम ही आंकड़ों के झूठे खेल पर टिका हो, तो निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता की कल्पना करना कठिन हो जाता है।
विशेषज्ञों ने सरकार से मांग की है कि विज्ञापन आवंटन प्रक्रिया में डिजिटल पहुंच, वास्तविक पाठक संख्या और स्वतंत्र ऑडिट को अनिवार्य किया जाए। साथ ही, झूठे आंकड़े प्रस्तुत करने वाले मीडिया संस्थानों पर सख्त कार्रवाई की आवश्यकता बताई जा रही है।

माना जा रहा है कि यदि समय रहते इस व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग जारी रहेगा, बल्कि आम जनता का मीडिया से विश्वास भी और गहराता चला जाएगा।
मजेदार बात यह भी देखने को मिलती है कि पत्रकारों के ठेकेदार इस पर अपना मुख खोलने की हिम्मत नहीं कर पाते और बुद्धिजीवी लोगों का नेतृत्व करने के दावे करते रहते है ।भारत में हजारों संगठन अपने अपने तरीके से पत्रकारों के लिए काम कर रहे है लेकिन स्थिति कभी भी सुधार की और नहीं बढ़ पाई है ।








