नवा रायपुर 4 फरवरी ,
हिम नयन न्यूज़/ब्यूरो/ वर्मा
सहज योग संस्थापक परम पूज्य श्री माता जी निर्मला देवी ने सहस्रार चक्र के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि सहस्रार का सार तत्व एकीकरण है।

सहस्रार में सभी चक्र और देवतत्त्व समाहित होते हैं, और जब साधक की कुंडलिनी सहस्रार तक पहुँचती है, तब उसका मानसिक, भावनात्मक, आध्यात्मिक और भौतिक जीवन एक समग्रता में एकीकृत हो जाता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अवस्था किसी बाहरी प्रभाव से नहीं, बल्कि भीतर की शक्ति से प्राप्त होती है। जब व्यक्ति अपनी आत्मा को कार्य करने की अनुमति देता है—“हाँ, मेरी आत्मा कार्यान्वित हो”—तब उसके कर्म आत्मानुकूल हो जाते हैं और वह किसी भी प्रकार की गुलामी से मुक्त हो जाता है। यही समर्थ होने की अवस्था है—जहाँ व्यक्तित्व शक्तिशाली, लोभ और गलत विचारों से मुक्त तथा बाधाओं से परे होता है।

परम पूज्य माता जी ने कहा कि सहजयोग न तो नया है और न ही क्षणिक—यह पहले भी था, आज भी है और भविष्य में भी स्थापित रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि आध्यात्मिक पथ पर संख्या से अधिक शुद्धता और ईमानदारी का महत्व है। माँ के रूप में उनकी इच्छा थी कि अधिक से अधिक लोग इस यात्रा में सहभागी बनें, परंतु किसी भी प्रकार की बेईमानी से मार्ग से विचलित होना उचित नहीं।











