/नौणी विश्वविद्यालय में औषधीय पौधों को बचाने की मुहिम, वैज्ञानिकों और किसानों का साझा संकल्प

नौणी विश्वविद्यालय में औषधीय पौधों को बचाने की मुहिम, वैज्ञानिकों और किसानों का साझा संकल्प

वन बल प्रमुख डॉ. संजय सूद के प्रेरक सुझाव, प्रगतिशील किसानों को किया सम्मानित

सोलन 31 मार्च,
हिम नयन न्यूज़/ब्यूरो/ वर्मा

हिमाचल प्रदेश के सोलन स्थित डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी में एक ऐसा भावनात्मक और प्रेरणादायक माहौल देखने को मिला, जहां विलुप्त हो रहे औषधीय पौधों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों, किसानों और वन अधिकारियों ने एकजुट होकर मंथन किया।

“किसान सहभागिता के माध्यम से विलुप्तप्राय एवं संकटग्रस्त औषधीय एवं सुगंधित पौधों के रणनीतिक प्राथमिकता निर्धारण” विषय पर आयोजित इस एक दिवसीय कार्यशाला में सभी ने इस बात पर चिंता जताई कि यदि अभी प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इन अनमोल औषधीय धरोहरों से वंचित हो सकती हैं।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वन बल प्रमुख एवं जाइका वानिकी परियोजना के मुख्य परियोजना निदेशक डॉ. संजय सूद ने कहा कि हिमाचल में औषधीय पौधों की खेती केवल पर्यावरण संरक्षण ही नहीं, बल्कि ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने का भी सशक्त माध्यम बन सकती है।

उन्होंने भावुक स्वर में कहा कि “ये पौधे सिर्फ जड़ी-बूटियां नहीं, बल्कि हमारी परंपरा, स्वास्थ्य और भविष्य की पूंजी हैं।”

उन्होंने जलवायु परिवर्तन के कारण इन पौधों के प्राकृतिक आवास पर पड़ रहे खतरे की ओर इशारा करते हुए सभी से संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास करने की अपील की।


इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजेश्वर सिंह चंदेल ने कहा कि औषधीय खेती किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत जरिया बन सकती है, लेकिन इसके लिए वैज्ञानिक तकनीकों, गुणवत्ता मानकों और मजबूत सप्लाई चेन की आवश्यकता है। उन्होंने किसानों और वैज्ञानिकों के बीच समन्वय को इस दिशा में सबसे बड़ा हथियार बताया।

कार्यक्रम की शुरुआत वानिकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. सी.एल. ठाकुर के स्वागत संबोधन से हुई, जिसमें उन्होंने पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में औषधीय पौधों के महत्व को भावनात्मक रूप से रेखांकित किया। वहीं वन उत्पाद विभाग के प्रमुख डॉ. यशपाल शर्मा ने बताया कि विश्वविद्यालय वर्तमान में 32 औषधीय एवं सुगंधित पौधों पर शोध कर रहा है और कई प्रजातियों के लिए आधुनिक खेती तकनीकों को विकसित किया जा चुका है।

तकनीकी सत्र में हिमालयन फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट, शिमला के डॉ. संदीप शर्मा, जाइका परियोजना के डॉ. राजेश चौहान और पूर्व प्रोफेसर डॉ. रविंदर रैना ने दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की।

कार्यक्रम के दौरान वन संसाधन एवं पर्यावरण उद्यमिता केंद्र का उद्घाटन भी किया गया, जो भविष्य में युवाओं और किसानों के लिए नए अवसरों के द्वार खोलेगा।

सबसे भावुक क्षण तब आया, जब प्रगतिशील किसानों—पवन कुमार (चंबा), ओम प्रकाश (कांगड़ा), राजेश कुमार कंवर और हरदेश बत्रा (सिरमौर) तथा कृपाल सिंह (शिमला)—को औषधीय खेती में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इन किसानों की आंखों में चमक और गर्व यह बता रहा था कि उनकी मेहनत अब एक बड़े बदलाव का हिस्सा बन रही है।

यह कार्यशाला केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक संदेश थी—कि अगर आज हम प्रकृति की इस अमूल्य धरोहर को बचाने के लिए आगे नहीं आए, तो कल बहुत देर हो जाएगी।