/घरों के बुझते चूल्हे और बढ़ते कैटरिंग कारोबार—

घरों के बुझते चूल्हे और बढ़ते कैटरिंग कारोबार—

रसोई से रोज़गार तक का बदलता सफर।

शिमला 7 अप्रैल,
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो/वर्मा

आज के आधुनिक दौर में जहां जीवनशैली तेजी से बदल रही है, वहीं घरेलू रसोई की परंपरा भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है।

कभी घरों में चूल्हे की आंच पर बनने वाला भोजन परिवार और संस्कृति का प्रतीक होता था, लेकिन अब उसकी जगह कैटरिंग सेवाओं और पेशेवर रसोइयों ने ले ली है।

शादी-ब्याह, तीज-त्योहार और अन्य सामाजिक आयोजनों में पहले घर के लोग मिलकर खाना बनाते थे। यह परंपरा केवल भोजन तक सीमित नहीं थी, बल्कि आपसी मेल-जोल और सामाजिक जुड़ाव का भी माध्यम थी।

आज की व्यस्त दिनचर्या और सुविधा की बढ़ती चाहत ने इस परंपरा को काफी हद तक बदल दिया है।

इसी बदलाव के साथ एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल रहा है—रोजगार के क्षेत्र में। पहले जो लोग दिहाड़ी मजदूरी करते थे, खासकर नेपाली और अन्य बाहरी मजदूर, अब बड़ी संख्या में रसोइयों (कुक) के रूप में काम करने लगे हैं।

कैटरिंग और आयोजनों में कुशल रसोइयों की बढ़ती मांग ने उन्हें एक नया और अपेक्षाकृत बेहतर आय का साधन प्रदान किया है।

आज ये रसोइये बड़े आयोजनों में सैकड़ों लोगों का भोजन तैयार कर रहे हैं और इस क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। कई जगहों पर तो यह एक संगठित व्यवसाय का रूप ले चुका है, जहां टीम बनाकर काम किया जाता है और तय पैकेज के अनुसार सेवाएं दी जाती हैं।

कैटरिंग उद्योग के इस विस्तार ने जहां रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं, वहीं पारंपरिक घरेलू भोजन की संस्कृति को भी प्रभावित किया है। घर के बने खाने का स्वाद, अपनापन और पारिवारिक सहभागिता अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

हालांकि, यह बदलाव पूरी तरह नकारात्मक भी नहीं है। एक ओर जहां लोगों को सुविधा मिल रही है, वहीं दूसरी ओर श्रमिक वर्ग को नए रोजगार के अवसर भी मिल रहे हैं।

अब चुनौती यही है कि आधुनिकता और सुविधा के इस दौर में हम अपनी पारंपरिक रसोई संस्कृति और सामाजिक जुड़ाव को किस तरह सहेज कर रख पाते हैं। क्योंकि बदलते समय के साथ अगर चूल्हे की आंच धीमी पड़ रही है, तो उससे जुड़े रिश्तों की गर्माहट को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है।