संकलन एन एल वर्मा
एक छोटे से गांव में एक दंपत्ति रहता था। वर्षों तक संतान सुख से वंचित रहने के बाद उन्होंने पूजा-पाठ, व्रत और मन्नतें मांगीं। अंततः उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई—जिसका नाम उन्होंने रतन रखा।
रतन के जन्म से घर में खुशियों की बहार आ गई। माता-पिता ने उसे अपने जीवन का केंद्र बना लिया। वे उसकी हर इच्छा पूरी करते, चाहे वह छोटी हो या बड़ी। लेकिन जहां पिता अनुशासन सिखाना चाहते थे, वहीं मां का स्नेह धीरे-धीरे अंधी ममता में बदलने लगा।
रतन बड़ा होने लगा। अब उसकी कुछ आदतें बिगड़ने लगी थीं। वह झूठ बोलता, स्कूल से भाग जाता, और गलत संगत में पड़ने लगा। पिता उसे समझाते, डांटते भी, लेकिन मां हर बार बीच में आ जाती—
“अभी बच्चा है, समझ जाएगा…”
धीरे-धीरे रतन को यह एहसास हो गया कि उसकी हर गलती माफ हो जाएगी। उसने सही और गलत का फर्क समझना ही बंद कर दिया। अब वह छोटे-छोटे झूठ और शरारतों से आगे बढ़कर बड़े गलत काम करने लगा।
एक दिन उसकी गलतियों की हद पार हो गई। उसने एक गंभीर अपराध कर दिया। इस बार कानून ने उसे पकड़ लिया और अदालत ने उसे सजा सुना दी।
अब रतन जेल की काल कोठरी में बंद था। वहां अकेलेपन में उसने अपने जीवन के हर पल को याद किया। उसे अपनी गलतियां समझ आने लगीं। उसे पछतावा हुआ—लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
सजा मिलने के बाद उसने अपनी मां से मिलने की इच्छा जताई। जब मां उससे मिलने आई, तो वह रोते हुए उसे गले लगाने लगी।
लेकिन तभी अचानक रतन ने गुस्से में आकर मां को धक्का दिया और घायल कर दिया।
मां हैरान और दुखी थी—
“बेटा, ये क्या कर रहे हो?”
रतन की आंखों में आंसू थे। उसने कहा—
“मां, अगर आपने मुझे बचपन में सही और गलत का फर्क सिखाया होता… मेरी गलतियों पर पर्दा न डाला होता… तो आज मैं अपराधी नहीं होता। यह सजा मुझे नहीं, आपकी अंधी ममता को मिली है।”
यह सुनकर मां फूट-फूटकर रो पड़ी।
सीख (मोरल)
अत्यधिक लाड़-प्यार और अंधा प्रेम बच्चों को सही रास्ते से भटका सकता है।
सच्चा प्रेम वही है, जो समय पर संस्कार, अनुशासन और सही-गलत की पहचान सिखाए।








