/मनमोहन सिंह ‘दानिश’ की ग़ज़ल

मनमोहन सिंह ‘दानिश’ की ग़ज़ल

सोलन 16 सितंबर,
हिम नयन न्यूज/ ब्यूरो

वही झगड़े वही मसले वही आघात हैं साथी,
कहीं कुछ भी नहीं बदला वही दिन रात हैं साथी,

अभी भी रो रहा बचपन कहीं सुनसान गलियों में ,
अभी भी भूख है पसरी वही हालात हैं साथी,

हवेली तक तो आती हैं सभी राहें, उजालों की,
मगर जुम्मन की खोली में अभी भी रात है साथी,

मरा ,फिर आज इक दहकां लगा फंदा सवेरे ही,
किसानों को मिली अब तक यही सौगात है साथी।

हमारे ही पसीने से बड़े ऐवान बनते हैं ,
जुड़े इनसे हमारे भी सभी जज़्बात हैं साथी।।

सुनो चंदा ये पूनम का हमारे घर भी उतरेगा,
रहें हम क्यों अमावस में भला क्या बात है साथी,

लड़ाई ये नहीं महदूद रोटी और खोली तक,
नज़र में आज तो अपनी सभी महलात हैं साथी ।।

— मनमोहन सिंह ‘दानिश’

दहकां: किसान
ऐवान: महल