/मुद्दा कलम की साख का है

मुद्दा कलम की साख का है

सोलन 7 जुलाई ,
हिम नयन न्यूज/ब्यूरो/ साभार मनमोहन सिंह

खींचों न कमानों को न तलवार निकालो
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकलो’

मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी का ये शेर पूरी कलम की ताकत को बयां करता है और जहां जहां भी लेखन की, पत्रकारिता की या अखबार की बात होती है, ये शेर अक्सर सुनने को मिलता है।

किसी ज़माने में गरीबों, मजमूलों, दबे कुचलों की लड़ाई अखबार लड़ा करते थे। ये अखबार सरकार का स्वाभाविक विपक्ष भी होते थे। सरकार किसी की हो पत्रकारों की कलम सवाल पूछा करती थी। उस समय पत्रकार लोकसंपर्क विभाग का काम नहीं करते थे और न ही कोई पी आर एजेंसी चलाते थे।

मेरी खुशनसीबी है कि मैने ऐसे पत्रकारों के साथ काम किया है। मैने जनसत्ता जैसे अखबार और जीतेंद्र बजाज व प्रभाष जोशी जैसे संपादकों के साथ अपने पत्रकारिता के जीवन के दस साल गुजारे हैं।

रामनाथ गोयनका जैसे अखबार के मालिक देखे हैं। एक समय था जब मुख्यमंत्री तक किसी पत्रकार का इंतज़ार किया करते थे और पूरा समाज पत्रकारों को बहुत इज़्ज़त की नज़र से देखता था।

यह बात सही है कि उस समय भी कुछ बिकाऊ माल होता था पर वे लोग गिनती के होते थे और हमेशा मज़ाक का कारण बने रहते थे।

एक समय था जब जनसत्ता में उसके संवाददाता का किसी नेता, या मंत्री से दोस्ती होना, उससे बिना काम मिलते रहना अच्छा नहीं माना जाता था।
किसी संवाददाता को कभी सरकारी एडवरटाइजमेंट लाने को नहीं कहते थे। इसके लिए अलग विभाग था।

हालांकि रामनाथ गोयनका के देहांत के बाद जो बदलाव अखबार की नीति में आए उनसे जनसत्ता का स्तर भी गिरा। उसकी छवि कुछ धूमिल हुई लेकिन फिर भी उसका स्थान बाकी कई अखबारों से ऊंचा रहा।

आज के हालत में जब कि हर गली मुहल्ले से पत्रकारों की फ़ौज निकल कर सोशल मीडिया में आ रही है, यह पता लगाना बहुत कठिन हो गया है कि इनमें से कौन असली पत्रकार है और कौन नकली।

आज तो लोग पूछते हैं कि आप कौन सी पार्टी के पत्रकार हैं।

खबरी चैनलों ने तो और भी कमाल कर रखा है उनके एंकर तो जैसे बदतमीजी की पूरी ट्रेनिंग ले कर आते हैं। बाकी रहे यूट्यूब चैनल, उनमें कुछ एक ऐसे हैं जो बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।

बाकी केवल धंधे चला रहे हैं। अभी दो एक दिन पहले सिरमौर की एक महिला पत्रकार ने बाकायदा दो पत्रकारों का नाम लेकर उन पर खुले रूप से भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाए हैं। कहीं एक पत्रकार पांच लाख की रिश्वत के सिलसिले में पकड़ में आया है।

आज दुनियां के लिए सोशल मीडिया ब्लैक मेल की दुकान बन गया है। इस वजह से पूरी पत्रकारिता संदेह के घेरे में है। उसका पूरा सम्मान रसातल में चला गया है।

ब्लैक मेल और भ्रष्टाचार में लिप्त इन कथित पत्रकारों से कानून तो अपनी तरह से निपटता ही रहेगा, लेकिन अपनी साख को बचाने के लिए एक लड़ाई उन पत्रकारों को भी लड़ना पड़ेगी जो आज भी ईमानदारी से पत्रकारिता और कलम की गरिमा को बचाना चाहते हैं।

उसका तरीका है कि वे लोग खुद अपने तरीके से खबरों को लोगों तक पहुंचाएं। फिर चाहे वो सोशल मीडिया हो, रेडियो या फिर कोई अखबार रसाला।

काम बहुत कठिन है पर नामुमकिन नहीं। मैं ऐसे बहुत से पत्रकारों को जनता हूं जो ऐसा कर सकते हैं। हम मिल कर भी इस ओर बढ़ सकते हैं। अगर पत्रकारिता की साख बचानी है तो ये सब तो करना ही पड़ेगा।

काम मुश्किल है पर इरादा मजबूत हो तो क्या नहीं होता।

दिल में हो जिनके हौसला ऊंची उड़ान का
कब देखते हैं कद वो भला आसमान का