ग़मों की रात लंबी है इसे गा कर बिताते हैं
कि छेड़ो तान तुम कोई तराना हम सुनाते हैं
जला है आशियां तेरा तो घर मेरा भी डूबा है
चलो इक साथ मिलजुल कर इन्हें फिर से बनाते हैं
मुहब्बत के बिना जीना भला जीना भी क्या जीना
सलीका प्यार करने का ज़माने को सिखाते हैं
तुम्हारी जो भी तल्खी है उसे तुम छोड़ दो अब तो
हमारे साथ जो गुज़री उसे हम भूल जाते हैं
नहीं मिलता किसी को भी मुकम्मल आसमां ‘दानिश’
मिले जितना हमें यारो उसे दिल में बसाते हैं
ग़मों की रात लंबी है इसे गा कर बिताते हैं
कि छेड़ो तान तुम कोई तराना हम सुनाते हैं
— मनमोहन सिंह ‘दानिश’








