बच्चों में बढ़ रही नजदीक दृष्टि दोष की समस्या पर जागरूकता
चंडीगढ़, 21 नवंबर,
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो/ वर्मा
पीजीआईएमईआर के एडवांस्ड आई सेंटर के पीडियाट्रिक ऑप्थेल्मोलॉजी डिविजन ने 14 से 21 नवंबर तक आयोजित नेशनल मायोपिया अवेयरनेस वीक को सफलतापूर्वक संपन्न किया।
इस सप्ताह का उद्देश्य बच्चों और अभिभावकों में मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) के बढ़ते जोखिम को लेकर जागरूकता फैलाना था।
कार्यक्रम की शुरुआत आउटपेशेंट पीडियाट्रिक ऑप्थेल्मोलॉजी क्लिनिक में आने वाले छोटे बच्चों के लिए एक मनोरंजक व रचनात्मक कलरिंग प्रतियोगिता से हुई।
पूरे सप्ताह के दौरान अभिभावकों को सूचनात्मक पम्फलेट वितरित किए गए और नियमित रूप से आंखों की जांच कराने, मायोपिया की शीघ्र पहचान तथा इसकी प्रगति धीमी करने के उपायों पर विस्तृत जानकारी दी गई।

पीजीआईएमईआर के एडवांस्ड आई सेंटर का पीडियाट्रिक ऑप्थेल्मोलॉजी डिविजन बच्चों में होने वाली विभिन्न नेत्र समस्याओं की जांच, इलाज और जागरूकता के लिए समर्पित है। यहां चार अनुभवी विशेषज्ञ — डॉ. जसप्रीत सुखीजा, डॉ. सृष्टि राज, डॉ. श्वेता चौरसिया और डॉ. सवलीन कौर सेवाएं दे रहे हैं।
“हमारी क्लिनिक में हर महीने 50-60 नए बाल मायोपिया मरीज आ रहे हैं, जिनमें से लगभग 43% हाई मायोपिक हैं,” यह जानकारी दी डॉ. जसप्रीत सुखीजा, प्रोफेसर, पीडियाट्रिक ऑप्थेल्मोलॉजी सर्विसेज ने। यह आंकड़ा इस समस्या की गंभीरता और समय पर हस्तक्षेप की आवश्यकता को दर्शाता है।
पीजीआईएमईआर के ये स्थानीय आंकड़े राष्ट्रीय और वैश्विक रुझानों से मेल खाते हैं। शोधों के अनुसार बच्चों में मायोपिया तेजी से बढ़ रहा है, जिसके पीछे आधुनिक जीवनशैली—अधिक स्क्रीन टाइम और कम आउटडोर गतिविधियों—को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
भारत में अनुमान है कि 2030 तक हर तीन में से एक शहरी बच्चा मायोपिक हो सकता है, और यह प्रचलन 2050 तक 48% तक पहुंचने की संभावना है।
बचपन में मायोपिया सिर्फ चश्मा लगाने का मामला नहीं है—हाई मायोपिया से भविष्य में रेटिनल डिटैचमेंट या ग्लूकोमा जैसे गंभीर नेत्र रोगों का जोखिम बढ़ जाता है।
इसी कारण पीजीआईएमईआर की टीम अभिभावकों से आग्रह करती है कि वे अपने बच्चों की आंखों की समय पर जांच करवाएं, खासकर यदि परिवार में मायोपिया का इतिहास हो।

साथ ही स्क्रीन टाइम सीमित करने और आउटडोर गतिविधियों को बढ़ाने जैसी जीवनशैली में बदलाव की भी सलाह दी जाती है।
मायोपिया की प्रगति धीमी करने के लिए अब कई क्लीनिकल विकल्प जैसे लो-डोज एट्रोपिन और स्पेशल स्मार्ट ग्लासेस भी उपलब्ध हैं।










