चंडीगढ़, 29 अगस्त,
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो /वर्मा ।
पीजीआईएमईआर के गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सर्जरी, एचपीबी एवं लीवर ट्रांसप्लांटेशन विभाग की ओर से छठे प्रो. बी.एल. तलवार स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और आधुनिक तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच सर्जिकल शिक्षा में शिक्षक और गुरु-शिष्य परंपरा की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया।

मुख्य वक्ता किम्स हॉस्पिटल्स, हैदराबाद के डॉ. आर.ए. शास्त्री ने “द टीचर लाइव्स ऑन: सर्जिकल विजडम फ्रॉम प्रो. बी.एल. तलवार इन द डिजिटल एरा ऑफ एआई एंड सिमुलेशन” विषय पर व्याख्यान दिया।
उन्होंने प्रो. तलवार के साथ अपने शुरुआती सर्जिकल प्रशिक्षण और पीजीआईएमईआर से करीब पांच दशक पुराने जुड़ाव को याद करते हुए इसे “घर वापसी जैसा अनुभव” बताया।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि एआई सिमुलेशन, चिकित्सा साहित्य के विश्लेषण, अवधारणात्मक शिक्षा और कौशल विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, लेकिन यह मानवीय मार्गदर्शन का विकल्प नहीं बन सकती।
उनके अनुसार, एआई तकनीक सिखा सकती है और जटिल परिस्थितियों का सिमुलेशन कर सकती है, लेकिन निर्णय क्षमता, साहस, करुणा, नैतिकता और विनम्रता जैसे गुण विकसित करने में शिक्षक की भूमिका सर्वोपरि है।

उन्होंने कहा, “तकनीक हाथ का मार्गदर्शन कर सकती है, लेकिन सर्जन को केवल शिक्षक ही गढ़ सकता है।” उन्होंने युवा सर्जनों से तकनीक को शिक्षक का विकल्प बनाने के बजाय शिक्षक को अधिक सक्षम बनाने वाले माध्यम के रूप में इस्तेमाल करने का आह्वान किया।
प्रो. बी.एल. तलवार को याद करते हुए डॉ. शास्त्री ने कहा कि वे अनुशासनप्रिय होने के साथ विद्यार्थियों के प्रति बेहद समर्पित गुरु थे। उन्होंने शिष्यों को कठिन परिस्थितियों से जूझने की स्वतंत्रता दी, लेकिन उन्हें बड़ी त्रासदी से बचाने के लिए हमेशा मार्गदर्शन और संरक्षण दिया।
उन्होंने कहा कि सर्जरी का वास्तविक अनुभव केवल किताबों या तकनीक से हासिल नहीं किया जा सकता, बल्कि गुरु के अनुभव और अंतर्दृष्टि से उसका गहरा संबंध है।
उन्होंने कहा, “सच्चा शिक्षक कभी नहीं मरता। वह अपने प्रशिक्षित प्रत्येक सर्जन में, हमारे हर निर्णय में और संस्थान की संस्कृति में जीवित रहता है।”
संस्थापक पुरोधाओं की विरासत को किया नमन
पीजीआईएमईआर के निदेशक प्रो. विवेक लाल ने प्रो. बी.एल. तलवार सहित संस्थान की संस्थापक पीढ़ी को श्रद्धांजलि अर्पित की।
उन्होंने कहा कि आज पीजीआईएमईआर जिस गौरव और प्रतिष्ठा का अनुभव कर रहा है, उसके पीछे संस्थापक पुरोधाओं की दूरदृष्टि, समर्पण और मूल्यों की बड़ी भूमिका है।
प्रो. लाल ने कहा, “आज हम जिस गौरव और प्रतिष्ठा का अनुभव कर रहे हैं, वह हमारे संस्थापक पुरोधाओं की देन है। उन्होंने हमें जो विरासत सौंपी है, उसका ऋण हम कभी नहीं चुका सकते।”
उन्होंने प्रो. तलवार की विनम्रता और मरीजों तथा विद्यार्थियों के प्रति समर्पण को याद करते हुए कहा कि महान सर्जन होने के बावजूद उन्होंने हमेशा सादगी और विनम्रता को बनाए रखा।
उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद बैंक की कतार में प्रो. तलवार के सामान्य व्यक्ति की तरह धैर्यपूर्वक खड़े रहने का प्रसंग भी साझा किया।
विभागाध्यक्ष प्रो. राजेश गुप्ता ने मुख्य वक्ता डॉ. आर.ए. शास्त्री को गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और हेपेटोपैंक्रियाटोबिलियरी सर्जरी के क्षेत्र का अग्रणी विशेषज्ञ बताया।
उन्होंने बताया कि डॉ. शास्त्री ने पीजीआईएमईआर से सर्जरी में एमएस किया और उत्कृष्टता के लिए प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट मेडल प्राप्त किया।
बाद में उन्होंने लैप्रोस्कोपिक सर्जरी तथा लीवर सर्जरी एवं प्रत्यारोपण के क्षेत्र में उन्नत प्रशिक्षण हासिल किया।
डॉ. शास्त्री ने निजाम्स इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, हैदराबाद में सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और विभागाध्यक्ष तथा डीन के रूप में सेवाएं दीं।
उनके 60 से अधिक अंतरराष्ट्रीय शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं।
प्रो. गुप्ता ने कहा कि डॉ. शास्त्री उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने इस विशेषज्ञता की अकादमिक और पेशेवर नींव को मजबूत किया तथा आज भी नई पीढ़ी के सर्जनों को प्रेरित कर रहे हैं।
वहीं डीन (अकादमिक) प्रो. संजय जैन ने स्मृति व्याख्यान को पीजीआईएमईआर की समृद्ध शैक्षणिक परंपरा की निरंतरता बताया।
उन्होंने कहा कि किसी संस्थान के लिए इससे बड़ी उपलब्धि नहीं हो सकती कि उसके विद्यार्थी आगे चलकर अपने क्षेत्र के शिक्षक और नेता बनें और फिर अपनी मातृसंस्था में लौटकर नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करें।
छठे प्रो. बी.एल. तलवार स्मृति व्याख्यान में सर्जिकल उत्कृष्टता के साथ मार्गदर्शन, विनम्रता, नैतिक चिकित्सा, मरीज-केंद्रित देखभाल और आधुनिक तकनीक के संतुलित उपयोग के महत्व को रेखांकित किया गया।
कार्यक्रम ने यह संदेश भी दिया कि एआई चिकित्सा शिक्षा को नई दिशा दे सकती है, लेकिन एक कुशल और संवेदनशील सर्जन के निर्माण में गुरु का स्थान आज भी सबसे महत्वपूर्ण है।








