सोलन 1 अक्टूबर,
हिम नयन न्यूज़/ब्यूरो/ वर्मा।
समंदर के थपेड़ों से नहीं डरना डराना है
उठो लहरों से टकराओ अगर उस पार जाना है।
हवाओं को दिखाने के लिए औकात उनकी अब
बुझाया आंधियों ने जो वो दीपक फिर जलाना है।
अदीबो तुम कहो रूदाद भीखू और जुम्मन की
कसीदे बादशाहों के पढ़े पूरा ज़माना है।
अभी है रात ये काली मगर अंतिम पहर में है
नई इक भोर का सूरज यक़ीनन अब तो आना है।
कहो राजा को तुम उठ के कि नंगा है वो महफिल में
कि सच्ची बात कहने में नहीं कुछ खौफ खाना है।
समेटो गोद में अपनी सभी यादें वो बचपन की
यही पूंजी रही बाकी यही अपना खज़ाना है।
चलो खिलते गुलाबों से चमन अपना सजाते हैं
खिजां के दौर को ‘दानिश’ हमें अब भूल जाना है।
— मनमोहन सिंह ‘दानिश’
अदीब: पढ़े लिखे, बुद्धिमान
रूदाद: कहानी, कथा
कसीदा: किसी की बेवजह तारीफ
खिजां: पतझड़







