/व्यंग्य ! सवारी अपने सामान की खुद जिम्मेदार है।

व्यंग्य ! सवारी अपने सामान की खुद जिम्मेदार है।


सोलन 17 अप्रैल
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो/
— मनमोहन सिंह


आख़िरकार बिहार में वह दिन आ ही गया, जिसका इंतज़ार एक राजनीतिक दल वर्षों से कर रहा था। भारतीय जनता पार्टी का मुख्यमंत्री बन गया और दशकों पुराना सपना साकार हो गया। लोकतंत्र की यही खूबसूरती है—जिसे बहुमत मिले, वही सत्ता संभाले।


लेकिन शपथ ग्रहण का दृश्य कुछ अलग ही कहानी कह गया। मुख्यमंत्री महोदय ने जब शपथ पढ़नी शुरू की, तो शब्दों के साथ उनका संघर्ष किसी प्रतियोगी परीक्षा जैसा लग रहा था। “कर्तव्य”, “निष्ठा”, “निर्वाह” जैसे शब्दों ने मानो उन्हें उलझाकर रख दिया। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे शपथ लेना भी अब एक तकनीकी प्रक्रिया बन चुकी है, जिसके लिए अलग से प्रशिक्षण या किसी अधिकारी की सहायता आवश्यक हो।


यह पहला मौका नहीं है जब भाषा और उच्चारण ने नेताओं को कठिनाई में डाला हो। कभी खेल मंत्री “मोहन बागान” को “मोहन बैगन” बोलते हैं, तो कभी बड़े-बड़े नेता संख्याओं और अंग्रेज़ी के बीच उलझ जाते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या शपथ की भाषा इतनी जटिल होनी चाहिए कि आम आदमी तो दूर, जनप्रतिनिधि भी उसमें अटक जाएं?


शायद अब समय आ गया है कि शपथ की भाषा को सरल बनाया जाए—इतनी सरल कि सातवीं पास व्यक्ति भी उसे सहजता से पढ़ सके। क्योंकि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व योग्यता से अधिक जनसमर्थन पर आधारित होता है, और यह भी एक सच्चाई है कि आज के दौर में शैक्षणिक डिग्री राजनीति की अनिवार्य शर्त नहीं रह गई है।


विडंबना यह है कि देश की बागडोर संभालने वाले कई चेहरे खुद भाषा और तथ्यों के साथ संघर्ष करते नजर आते हैं। ऐसे में शिक्षा और योग्यता पर उठते सवाल कहीं न कहीं व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं।


इस पूरे घटनाक्रम में नीतीश कुमार का नाम भी चर्चा में है, जिन्होंने यह कुर्सी छोड़ी। इतिहास उन्हें किस रूप में याद रखेगा, यह आने वाला समय बताएगा। फिलहाल इतना तय है कि सत्ता परिवर्तन के साथ उम्मीदें भी बदली हैं—और चिंताएं भी।


बिहार की वास्तविकता को समझने के लिए वहां जाना जरूरी नहीं। उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों में मेहनत करतीं, संघर्ष करतीं बिहारी महिलाओं और मजदूरों को देखकर ही स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यह तस्वीरें विकास के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच का अंतर साफ़ कर देती हैं।


जनता ने अपना फैसला दे दिया है, अब सरकार वही चलाएंगे जिन्हें जनादेश मिला है। लेकिन इस पूरे परिदृश्य के बीच एक चेतावनी बोर्ड हर जगह टांग देना चाहिए—
“सवारी अपने सामान की खुद जिम्मेदार है।”


क्योंकि लोकतंत्र में अंततः जिम्मेदारी जनता की ही होती है—चुनाव से पहले भी और उसके बाद भी।