सोलन 6 जुलाई
सुना है कि आजकल अखबारों का प्रसार लगातार गिर रहा है। लोग अखबार खरीदते कम हैं और जो खरीदते भी हैं, वे “बिजली कब जाएगी”, मौसम का हाल या टेंडर-निविदा के विज्ञापन देखकर अखबार तह कर देते हैं। बाकी खबरों को पढ़ने का धैर्य अब किसके पास है!
मजे की बात यह है कि सरकारी आँकड़े बताते हैं कि देश में साक्षरता लगातार बढ़ रही है। यानी पढ़े-लिखे लोग बढ़ रहे हैं, लेकिन पढ़ने वाले घट रहे हैं। इससे बड़ा विरोधाभास भला क्या होगा?
हमारे यहाँ किताबें फुटपाथ पर बिकती हैं और जूते वातानुकूलित शोरूम में। समाज की प्राथमिकताओं का इससे बेहतर चित्र शायद ही कहीं मिले। किताबों पर धूल जमती है और मोबाइल की स्क्रीन पर अंगूठे घिसते रहते हैं।
टीवी पर नेताओं की बहसें देखिए। कई बार लगता है कि तर्कों से उनका रिश्ता उतना ही है जितना ऊँट का समुद्र से। लेकिन उनसे भी ज़्यादा कमाल उन पत्रकारों का है जो हर बयान में दूरदर्शिता और हर गलती में “मास्टर स्ट्रोक” खोज निकालते हैं। कभी-कभी लगता है कि पत्रकारिता और चाटुकारिता के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो गई है कि पहचानना मुश्किल हो गया है।
लोकतंत्र में पत्रकार का पहला धर्म सत्ता से सवाल पूछना है। विपक्ष से सवाल पूछना भी ज़रूरी है, लेकिन सत्ता से सवाल पूछना उसकी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है। जब सवालों की दिशा बदल जाती है, तब लोकतंत्र की दिशा भी बदलने लगती है।
इतिहास बताता है कि हर तानाशाह सबसे पहले सूचना के स्रोतों पर कब्ज़ा करना चाहता है। क्योंकि जिसे सूचना पर नियंत्रण मिल गया, वह धीरे-धीरे लोगों की सोच पर भी नियंत्रण स्थापित कर लेता है। फिर झूठ को पूरे आत्मविश्वास से बार-बार दोहराइए, वह धीरे-धीरे सच जैसा लगने लगता है।
हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम तथ्य जाँचने की बजाय उन्हें आगे बढ़ाने में विश्वास रखते हैं। इतिहास की किताबें पढ़ना हमें बोझ लगता है, लेकिन सोशल मीडिया की अपुष्ट पोस्ट हमें तुरंत सच लगने लगती हैं।
यही कारण है कि कभी कोई दावा करता है कि सरदार वल्लभभाई पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री बनने वाले थे, तो कोई कह देता है कि नेता जी सुभाषचंद्र बोस ही स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। इन दावों की सत्यता जानने के लिए केवल कुछ मिनट इतिहास पढ़ना काफी है, लेकिन पढ़े कौन? हम तो शीर्षक पढ़कर ही विद्वान बनने का दावा कर देते हैं।
आज सूचना की कमी नहीं है, कमी है पढ़ने की आदत की। हम साक्षर तो हो गए, लेकिन अध्ययनशील नहीं बन पाए। हमने अक्षर पहचान लिए, पर विचारों को समझने की कला खो दी।
फिर भी उम्मीद बाकी है। कलम की ताकत कभी खत्म नहीं होती। उसे दबाया जा सकता है, डराया जा सकता है, खरीदा भी जा सकता है, लेकिन हमेशा के लिए हराया नहीं जा सकता। इतिहास इसकी गवाही देता है। झूठ चाहे जितना ऊँचा उड़ ले, अंततः उसे सच की धरती पर उतरना ही पड़ता है।
इसलिए किताबें पढ़िए, अखबार पढ़िए, इतिहास पढ़िए और सबसे बढ़कर सवाल पूछिए। क्योंकि जो समाज पढ़ना छोड़ देता है, वह एक दिन सोचना भी छोड़ देता है।










