सोलन 15 दिसंबर,
हिम नयन न्यूज/ब्यूरो/मनमोहन सिंह
जब सरकार कर्मचारियों को उनका ही बकाया वेतन देती है और उसे “सौगात” कहकर पेश किया जाता है, तब सवाल केवल शब्दों का नहीं, सोच और संवेदना का भी होता है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज की मुख्यधारा की पत्रकारिता सत्ता के आगे नतमस्तक दिखाई देती है और सच को उसकी असली पहचान देने से कतराती है।
अधिकांश मामलों में कर्मचारी और मजदूर अपने हक़ की रकम पाने के लिए वर्षों तक संघर्ष करते हैं। वे सड़कों पर उतरते हैं, धरने देते हैं, आंदोलन करते हैं और कई बार जेल तक जाते हैं।
इसके बावजूद उन्हें उनका पूरा बकाया नहीं, बल्कि उसका एक छोटा-सा हिस्सा, वह भी किश्तों में, दिया जाता है। संयोग से यह “उदारता” अक्सर चुनावों के आसपास ही दिखाई देती है।
ऐसे में जब अख़बारों की सुर्खियाँ यह घोषणा करती हैं कि “सरकार ने कर्मचारियों को सौगात दी”, तो यह केवल शब्दों की बाज़ीगरी नहीं, बल्कि पीड़ा का उपहास बन जाती है। जो राशि कर्मचारियों का अधिकार है, उसे दया या उपहार की तरह प्रस्तुत करना सच्चाई को विकृत करना है।
सौगात वह होती है जो स्वेच्छा से दी जाए, अधिकार वह होता है जिसे छीना नहीं जा सकता।
अपने ही पैसे को पाने के लिए वर्षों तक धक्के खाना और फिर उसे ‘तोहफ़ा’ कहा जाना, लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता सत्ता की भाषा नहीं, जनसरोकारों की आवाज़ बने।
जब तक कर्मचारियों के अधिकारों को ‘सौगात’ कहा जाता रहेगा, तब तक व्यवस्था की संवेदनहीनता उजागर होती रहेगी।









