नई दिल्ली, 5 जून,
हिम नयन न्यूज़ /ब्यूरो /वर्मा
(स्रोत: श्री माताजी निर्मला देवी का प्रवचन, 14 मई 1982)
सहजयोग की संस्थापक श्री माता जी निर्मला देवी ने 14 मई 1982 को दिए गए एक प्रवचन में यकृत (लीवर) को मानव व्यक्तित्व, मानसिक संतुलन और चित्त की स्थिरता से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण अंग बताया।

उन्होंने कहा है कि व्यक्ति के स्वभाव में दिखाई देने वाले कई नकारात्मक गुण, जैसे शीघ्र क्रोधित होना, चिड़चिड़ापन, असंतोष, दूसरों की आलोचना करना तथा हर समय झल्लाते रहना, यकृत दोष के संकेत हो सकते हैं।
श्री माताजी के अनुसार यकृत का सीधा संबंध चित्त से है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों का यकृत प्रभावित होता है, उनका चित्त भी अस्थिर हो जाता है।
ऐसे व्यक्ति एकाग्रता बनाए रखने में कठिनाई अनुभव करते हैं और उनका ध्यान लगातार इधर-उधर भटकता रहता है।
उन्होंने इसे दैनिक जीवन में व्यवहार और कार्यक्षमता पर पड़ने वाले प्रभावों से भी जोड़ा।
प्रवचन में श्री माताजी ने बताया कि यकृत शरीर से विषैले तत्वों को उष्णता के रूप में बाहर निकालने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि यकृत सही ढंग से कार्य नहीं करता, तो यह अतिरिक्त उष्णता शरीर में ही बनी रहती है, जिसके कारण व्यक्ति उग्र स्वभाव, मानसिक अशांति और अन्य समस्याओं का अनुभव कर सकता है।
उन्होंने आगे कहा कि सहजयोग में कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया शरीर के भीतर संतुलन स्थापित करने में सहायक होती है। उनके अनुसार कुंडलिनी जागरण के दौरान जिन लोगों का यकृत प्रभावित होता है, उन्हें कुछ समय के लिए अधिक उष्णता का अनुभव हो सकता है, लेकिन उचित विश्राम, शांति और आध्यात्मिक साधना के माध्यम से यकृत को संतुलित एवं स्वस्थ बनाया जा सकता है।

श्री माताजी ने अपने संदेश में यकृत की देखभाल, मानसिक संतुलन और आंतरिक शांति के महत्व पर विशेष बल देते हुए कहा कि स्वस्थ यकृत व्यक्ति के संतुलित व्यक्तित्व और स्थिर चित्त के लिए आवश्यक है।









