सोलन 16 अप्रैल,
हिम नयन न्यूज़/ ब्यूरो/ मनमोहन सिंह
जैसे हर फसल का अपना मौसम होता है, वैसे ही राजनीति का भी एक “मौसम” होता है—और यह मौसम है चुनावों का।
ठीक वैसे ही जैसे बरसात में अचानक हर तरफ मेंढकों की टर्र-टर्र गूंजने लगती है, पंचायत चुनाव नजदीक आते ही नेता भी चारों ओर सक्रिय नजर आने लगते हैं।
बरसात के मेंढक कुछ समय के लिए ही दिखते हैं—शोर मचाते हैं, ध्यान खींचते हैं और फिर चुपचाप गायब हो जाते हैं। कुछ ऐसी ही तस्वीर चुनावी मौसम में नेताओं की भी देखने को मिलती है।
वे हर गली, हर कार्यक्रम, हर शादी-ब्याह में नजर आते हैं—
मुस्कुराते हैं, वादे करते हैं और मतदाताओं को सपनों की दुनिया दिखाते हैं।
व्यंग्य की पंक्तियाँ इस सच्चाई को यूँ बयां करती हैं—
“मेंढक थोड़ा टर्राने लगे हैं,
मतदाताओं को लुभाने लगे हैं,
हमें देख मुस्कुराने लगे हैं,
हर शादी-ब्याह में जाने लगे हैं,
सब्जबाग सबको दिखाने लगे हैं,
पक्का चुनाव आने लगे हैं।”
लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं, ये “बरसाती मेंढक” फिर नजर नहीं आते।
पांच साल तक जनता उन्हें ढूंढती रह जाती है, लेकिन वे “हाइबरनेशन” में चले जाते हैं।
यह हमारे लोकतंत्र की एक विडंबना भी है कि एक बार चुने जाने के बाद प्रतिनिधि को पांच साल तक बदल पाना आसान नहीं होता।
ऐसे में यह व्यंग्य मतदाताओं को एक स्पष्ट संदेश देता है—
चुनाव के समय दिखने वाले चेहरों से सावधान रहें और सोच-समझकर उसी को चुनें, जिसे चुनने पर बाद में पछताना न पड़े।









