/जैसा अन्न वैसा मन: बदलती खानपान संस्कृति और समाज पर उसका प्रभाव

जैसा अन्न वैसा मन: बदलती खानपान संस्कृति और समाज पर उसका प्रभाव

चंडीगढ़ 31 मई,
हिम नयन न्यूज/ ब्यूरो/ वर्मा ।

भारतीय संस्कृति में सदियों से एक कहावत प्रचलित है—”जैसा अन्न वैसा मन।” यह कहावत केवल भोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे विचारों, व्यवहार और जीवनशैली से भी जुड़ी हुई मानी जाती है।

बदलते दौर में खानपान की आदतों में आए बदलावों ने इस कहावत को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

आज शहरों में एक दिलचस्प तस्वीर देखने को मिलती है। महंगी और चमचमाती कारों में आने वाले लोग सड़क किनारे लगी रेहड़ियों और फहड़ियों पर दो परांठों या साधारण भोजन के लिए कतार में खड़े दिखाई देते हैं। चंडीगढ़ का सेक्टर-22 इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां करोड़ों रुपये का व्यापार होता है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग भोजन के लिए स्थानीय रेहड़ियों पर ही निर्भर रहते हैं।

ऑनलाइन फूड डिलीवरी और क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स ने भोजन की उपलब्धता को आसान बना दिया है।

विभिन्न कंपनियां आकर्षक पैकेजिंग और तेज डिलीवरी के माध्यम से लोगों तक भोजन पहुंचा रही हैं। हालांकि, भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता और उसके सामाजिक प्रभाव को लेकर समय-समय पर सवाल भी उठते रहे हैं।

सामाजिक चिंतकों का मानना है कि भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि व्यक्ति के मानसिक और सामाजिक विकास का भी आधार है। यदि भोजन की तैयारी और स्वच्छता के मानकों की अनदेखी की जाती है, तो इसका प्रभाव स्वास्थ्य के साथ-साथ समाज की सोच और व्यवहार पर भी पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि नई पीढ़ी को दोष देने के बजाय समाज को अपनी खानपान संबंधी आदतों पर विचार करना चाहिए। भोजन चुनते समय केवल आकर्षक पैकेजिंग, ब्रांड या सुविधा को ही महत्व न देकर उसकी गुणवत्ता, स्वच्छता और पोषण मूल्य को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।

बदलते समय के साथ समाज भी बदल रहा है। यह परिवर्तन किस दिशा में जाएगा, इसका उत्तर भविष्य देगा, लेकिन इतना निश्चित है कि “जैसा अन्न वैसा मन” की सीख आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी।