क्या बदल रही है नाबालिग और बालिग की परिभाषा?
शिमला 2 अगस्त,
हिम नयन न्यूज़/ संपादकीय
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए एक प्रदर्शन ने केवल राजनीतिक हलचल ही नहीं पैदा की, बल्कि समाज और कानून के सामने एक नया प्रश्न भी खड़ा कर दिया है।
इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में ऐसे किशोर-किशोरियां शामिल हुए जिन्हें भारतीय कानून अभी नाबालिग मानता है। उनकी मुखर भागीदारी ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या आज की पीढ़ी को केवल आयु के आधार पर परिपक्वता की कसौटी पर परखा जा सकता है?
भारत में 18 वर्ष की आयु को सामान्यतः बालिग होने की सीमा माना गया है। इसके पीछे सामाजिक सुरक्षा, मानसिक विकास और कानूनी उत्तरदायित्व जैसे अनेक आधार हैं।
यही व्यवस्था अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में भी किसी न किसी रूप में लागू है। इसलिए केवल किसी आंदोलन या प्रदर्शन में युवाओं की भागीदारी को कानून बदलने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि आज की पीढ़ी पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक, तकनीक-संपन्न और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर मुखर है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने जानकारी तक उनकी पहुंच आसान बना दी है।
परिणामस्वरूप किशोर अब केवल शिक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपनी स्पष्ट राय रखते हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भागीदारी चाहते हैं।
यह स्थिति कानून निर्माताओं, शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों के लिए विचार का विषय अवश्य है। प्रश्न यह नहीं कि बालिग होने की आयु तुरंत बदल दी जाए, बल्कि यह है कि क्या वर्तमान कानून बदलते सामाजिक परिवेश और नई पीढ़ी की वास्तविकताओं के अनुरूप पर्याप्त हैं?
क्या युवाओं की बढ़ती जागरूकता और भागीदारी को नीति-निर्माण में अधिक महत्व दिया जाना चाहिए?
दूसरी ओर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उत्साह और परिपक्वता में अंतर होता है।
लोकतंत्र में भागीदारी का अधिकार जितना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक जिम्मेदारी, विवेक और कानून के प्रति सम्मान भी है।
इसलिए किसी भी बहस का निष्कर्ष भावनाओं के बजाय व्यापक सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और कानूनी अध्ययन के आधार पर ही निकलना चाहिए।
जंतर-मंतर का यह घटनाक्रम शायद कानून में तत्काल बदलाव का कारण न बने, लेकिन इसने एक नई बहस अवश्य शुरू कर दी है।
यह बहस केवल बालिग और नाबालिग की आयु सीमा की नहीं, बल्कि उस बदलते भारत की है जहां नई पीढ़ी अपनी पहचान, भागीदारी और जिम्मेदारी—तीनों को नए सिरे से परिभाषित करना चाहती है।
लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि हर पीढ़ी नए प्रश्न पूछती है और समाज उन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास करता है।








